जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 निरस्त करने का फैसला सही, रिटायर्ड जस्टिस कौल बोले? कश्मीरी पंडितों पर हुई बात कम।

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 निरस्त करने का फैसला सही, रिटायर्ड जस्टिस कौल बोले? कश्मीरी पंडितों पर हुई बात कम।

उमाकांत त्रिपाठी।
सुप्रीम कोर्ट से 25 दिसंबर को रिटायर हुए जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी ताकतों के आने के कारण विस्थापित हुए साढ़े 4 लाख कश्मीरी पंडितों के बारे में बहुत कम बातें हुई हैं। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि कश्मीरी पंडित इतना बड़ा वोट बैंक नहीं रहे कि राजनीति का ध्यान अपनी ओर नहीं खींच पाएं।
जस्टिस कौल SC की उस बेंच में भी शामिल थे, जिसने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को खत्म किए जाने को बरकरार रखा था। साथ ही राज्य और गैर-राज्य दोनों के द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच और रिपोर्ट करने के लिए इम्पार्टिअल ट्रुथ एंड रिकंसीलिएशन कमीशन स्थापित करने की सिफारिश की थी।
इसमें कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर में साल 1980 के बाद उग्रवाद के कारण शांति भंग होने से पहले विभिन्न समुदाय के लोग मिलजुल कर रहते थे। उन्हें समझ ही नहीं आया कि घाटी में हालात कैसे खराब हो गए। जस्टिस कौल खुद भी कश्मीरी पंडित हैं। उन्होंने कहा- 30 साल की बेलगाम हिंसा के बाद अब लोगों के लिए आगे बढ़ने का समय आ गया है।
अनुच्छेद 370 निरस्त करने का फैसला सर्वसम्मत
जस्टिस कौल ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को बरकरार रखने वाली सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों के बेंच के बारे में भी बात की। उन्होंने कहा- CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने सर्वसम्मत फैसला किया था। हर बड़ा फैसला बहस को जन्म देता है। ऐसे लोग भी होंगे जो फैसले पर अलग राय रखेंगे।
जस्टिस कौल कहते हैं कि इसका मुझ पर कोई असर नहीं पड़ता, क्योंकि फैसला किसी भी स्थिति पर एक राय होता है। हमें इसके बारे में अति संवेदनशील नहीं होना चाहिए। उन्होंने मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर में अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडितों के विस्थापन को लेकर चुप्पी पर अफसोस जताया।
4.50 लाख से अधिक लोग अपने ही देश से विस्थापित हो गए
कौल कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर में पहले सुरक्षा संबंधी चिंता कोई समस्या नहीं थी, लेकिन फिर पतन उस स्तर पर पहुंच गया जहां एक समुदाय के साढ़े 4 लाख से अधिक लोग अपने ही देश से विस्थापित हो गए। मुझे लगा कि इसके बारे में बहुत कम कहा गया है।
उन्होंने कहा कि शायद वे इतने बड़े मतदाता नहीं थे कि राजनीति का ध्यान अपनी ओर खींच पाते। स्थिति इस हद तक बिगड़ गई कि सेना बुलानी पड़ी, क्योंकि देश की क्षेत्रीय अखंडता खतरे में पड़ रही थी। जम्मू-कश्मीर के लोगों की एक पूरी पीढ़ी है जिसने बेहतर समय नहीं देखा।