रेपो रेट क्या है? समझे यहाँ

रेपो रेट क्या है? समझे यहाँ
रेपो रेट

रेपो रेट फिर से चर्चा में है, रिज़र्व बैंक ने रेपो रेट को फिर से बढ़ा दिया है. तो आज समझने की कोशिश करते है कि ये रेपो रेट होता क्या है?

रेपो रेट कुछ इस तरह से समझिए. घर या गाड़ी ख़रीदने के लिए आपके पास पूरे पैसे नहीं होते हैं तो आप बैंक में क़र्ज़ लेने जाते है. बैंक घर या गाड़ी गिरवी रखकर आपको लोन दे देते है. लोन चुकाने पर आपको मालिकाना हक़ के काग़ज़ मिल जाते हैं. अब सवाल है कि बैंक के पास क़र्ज़ देने के लिए पैसे कहाँ से आते हैं तो मोटे तौर पर इस पैसे का सबसे बड़ा सोर्स होता है डिपॉजिटर्स का पैसा. आप हम पैसा सेविंग अकाउंट में जमा रखते हैं जिस पर ब्याज का रेट कम होता है और बैंक यही पैसा लोन पर देते हैं ज्यादा रेट से.कम रेट पर डिपॉजिट और ज़्यादा रेट पर लोन, बैंक कुछ परसेंट के मार्जिन से मुनाफ़ा कमाते हैं.

बैंकों को डिपॉजिट के सारे पैसे लोन में देने की इजाज़त नहीं होती है. रिज़र्व बैंक भारत में बैंकों का रेग्यूलेटर भी है यानी वो करेंसी जारी करने के अलावा बैंकों के नियम क़ायदे भी तय करता है. बैंकों को निश्चित रक़म वहाँ लगाना होती है जहां रिज़र्व बैंक कहें. CRR यानी कैश रिज़र्व रेश्यो और SLR यानी स्टेचुटरी लिक्विडिटी रेश्यो यही काम करते है. डिपॉजिट और लोन के अनुपात में बैंकों को हमेशा निश्चित रक़म कैश में रखना होती है (CRR) और कुछ रक़म सरकारी बॉन्ड, सोने में (SLR). इन दोनों रेश्यो के पीछे आइडिया ये है कि बैंक डूब ना जाएँ , रिज़र्व बैंक इसे घटाते बढ़ाते रहती है. अभी CRR 4.5% है और SLR 18%. रिज़र्व बैंक के नियम के हिसाब से बैंकों को किसानों, MSME जैसे सेक्टर को निश्चित परसेंट लोन देना अनिवार्य है. मोटा अनुमान है कि सौ रुपये डिपॉजिट में लेने के बाद बैंक के पास ₹60 अपनी मर्ज़ी से लोन देने के लिए बचते हैं.

ये उतना सिंपल भी नहीं है, बैंकों को हमारी तरह लंबी अवधि के लोन की ज़रूरत कम ही पड़ती है ज़्यादातर ज़रूरत कम अवधि के लिए होती है जैसे एक से 15 दिन की अवधि के लिए. बैंकों को सारे रेश्यो बनाकर रखने होते है, डिपॉजिटर्स जब चाहे उसे पैसे देने होते है और फिर लोन देकर धंधा भी करना है. इस मनी मैनेजमेंट के लिए बैंक को कुछ दिनों के लिए पैसे की ज़रूरत पड़ती है जो वो रिज़र्व बैंक से उठाते है. इसे रिपर्चेस एग्रीमेंट या रेपो रेट कहते हैं. बैंक सिक्योरिटी के एवज़ में रिज़र्व बैंक से लोन लेते हैं. रिपर्चेस एग्रीमेंट होता है कि जब बैंक सिक्योरिटी वापस लेगी तो रिज़र्व बैंक को इतना प्रतिशत ब्याज देगी. बैंक इस रिपो रेट के ज़रिए सिग्नल भी देता है कि वो बाक़ी बाज़ार के लिए लोन का रेट बढ़ाना चाहता है या घटाना.पिछले महीने भर में ये रेट 4% से 4.9% पर पहुँच गया है. इसके बाद बैंकों ने भी हर तरह के लोन पर ब्याज दरों को बढ़ा दिया है.

ये चर्चा हम हिसाब किताब में पहले कर चुके हैं कि रिज़र्व बैंक रेपो रेट का इस्तेमाल महंगाई को घटाने के हथियार के रूप में करता है. क़र्ज़ लेना महँगा होगा तो लोग घर, गाड़ी लेने का फ़ैसला टाल सकते हैं. कंपनियाँ भी लोन लेकर नया प्रोजेक्ट लगाने के बारे में दस बार सोचेगी. अर्थव्यवस्था की रफ़्तार धीमी पड़ेगी, माँग घटेगी तो महंगाई भी घटेगी.

रेपो रेट का हथियार उल्टा भी पड़ सकता है कि कहीं महंगाई कम करने के चक्कर में अर्थव्यवस्था मंदी में ना चली जाए. रिज़र्व बैंक की पहली प्राथमिकता फ़िलहाल महंगाई कम करना है. RBI Act में 2016 में संशोधन किया गया. इसके बाद भारत सरकार हर पाँच साल में RBI को टार्गेट देती है कि महंगाई की दर कितनी रहें. 2026 तक टार्गेट है कि महंगाई दर 4% रहें. ये दर प्लस दो या मायनस दो हो सकती है. फ़िलहाल ये दर 7% से ज़्यादा है यानी 6% की लिमिट से ऊपर, इसलिए आने वाले महीनों में रेपो रेट के बढ़ने की ख़बर रिज़र्व बैंक से आती रहेगी तब आपको ये सर्च नहीं करना पड़ेगा कि रेपो रेट क्या है?