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अभी और भी कई रंग हैं जीवन के, कोरोना काल में कुछ पारा-पारा हुआ सा लगता है !

हमने दुनिया के हर रंग देखें, जिंदगी से कई जंग लड़ी, लेकिन मतला कुछ नहीं निकला। कभी अपनों का दर्द आसमान से बारिश की बूंदें की तरह सिर पर गिरने लगता और दर्द जिगर में होता रहा। सूनी गली में बंद दरवाज़े के सामने ख़्वाब की लकीरों को चुराकर चलता रहा। चोरी-चोरी हल्के-हल्के रात की छांव में धुंधली-धुंधली सी उम्मीद की लकीरों में जीवन के जद्दोजहद से खेलता रहा। बादलों पर हवाओं का खाट उड़ाता हुआ चलता रहा। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि ये वक्त हमें कुछ सिखलाने के लिए आया है। आज हमारे सामने कई समस्याएं खड़ी हैं जिसका मुकाबला करना है। कोविड-19 संक्रमण ने हमारे जीवन की पाठशाला यानि परिवार को खोखला कर दिया है। विज्ञान लाख प्रगति के दावे करे लेकिन कोरोना के मुश्किल वक्त में कई वर्जनाएं टूटती नजर आ रही हैं। हाल के दिनों में कोविड-19 संक्रमण के चलते मौत और जिंदगी के बीच की दूरी सिमट कर रह गई है। अक्सर हमने लोगों को कर्मों के आधार पर याद करने के लिए उनकी जयंती और पुण्यतिथि मनाने की परंपरा बनाई हैं। हमारी संस्कृति ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की परिकल्पना की है। लेकिन एक कोविड-19 वायरस ने समाज शास्त्र के उन सिद्धातों पर भी प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।

‘आदमी आजाद पैदा हुआ है लेकिन हर जगह बंधनों में जकड़ा हुआ है’। लेकिन आज के इस दौर में ऐसा लग रहा है कि आदमी आजाद तो पैदा हुआ है लेकिन आजाद ही मर रहा है। कबीर, रहीम, रैदास, तुलसीदास जी के तमाम दोहे, चौपाइयां और कहावतें अस्ताचल की परिधि से प्रतिध्वनित होकर हमारे कानों में वापस लौट रही है और अहसास दिला रही है कि इस दुनिया में कोई बंधन नहीं है ! हम उन्मुक्त से हो गए है। हमने अपनी चिंता को इसलिए कम कर दिया है कि हमारा भगवान पर भरोसा ज्यादा बढ़ गया है। जीवन जीने की चाहत में आभासी कमी आई है। डर का पारा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। ऐसा लग रहा है कि जिंदगी पारा पारा हुआ सा दिख रहा है।

कोविड-19 संक्रमण के इस दौर में लाखों लोगों ने अपनी जान गंवा दी है और जिन्हें अपनों तक का कंधा भी नसीब नहीं हुआ है। कई अस्पतालों से ऐसी भावनात्मक घटनाएं हुई हैं जिन्हें व्यक्त करने में सदियों लग जाएगी। हमारी सांस्कृतिक विरासत में व्यक्त की गई फिल्मों और साहित्य की घटनाओं में कथानक कम पड़ जाएगी। अपनों के खोने का गम और अपनों से जुदा होकर नहीं मिलने का गम श्मशान की उठती चिताओं के बीच संस्मरण की तरह लाखों करोड़ों लोगों के दिमाग में सदियों तक जीवित रहेंगी। कोविड-19 हमारी सामाजिक संस्थाओं पर सबसे बड़ा कुठाराघात है। कई लोग अपनों से बिछड़ गए है। कई बिछुड़े हुए लोगों से मौत के बाद भी मुलाकात नहीं कर पा रहे हैं। आदमी का मृतक शरीर कूड़े-कचरे से भी बेकार लग रहा है। परिवार, समाज, राष्ट्र सब कुछ ‘लॉकडाउन’ और बंद गली का आखिरी मकान लग रहा है।

परिवार एक ऐसी सामाजिक संस्था है जो आपसी सहयोग व समन्वय से क्रियान्वित होती है और जिसके समस्त सदस्य आपस में मिलकर अपना जीवन प्रेम, स्नेह एवं भाईचारा पूर्वक निर्वाह करते हैं। संस्कार, मर्यादा, सम्मान, समर्पण, आदर, अनुशासन आदि किसी भी सुखी-संपन्न एवं खुशहाल परिवार के गुण होते हैं। कोई भी व्यक्ति परिवार में ही जन्म लेता है, उसी से उसकी पहचान होती है और परिवार से ही अच्छे-बुरे लक्षण सीखता है। परिवार सभी लोगों को जोड़े रखता है और दुःख-सुख में सभी एक-दूसरे का साथ देते हैं। कहते हैं कि परिवार से बड़ा कोई धन नहीं होता हैं, पिता से बड़ा कोई सलाहकार नहीं होता हैं, मां के आंचल से बड़ी कोई दुनिया नहीं, भाई से अच्छा कोई भागीदार नहीं, बहन से बड़ा कोई शुभ चिंतक नहीं इसलिए परिवार के बिना जीवन की कल्पना करना कठिन है। जरा सोचिए इसे कैसे संजोना है और इसे किस कदर आगे बढ़ाना है ताकि हम अपने भावी पीढ़ी को बेहतर भविष्य दे सकें। एक बात अक्सर याद आती है कि ‘खुद को इतना महान जरूर बना लेना कि अपने बच्चों का आदर्श बन सको।’ एक अच्छा परिवार बच्चे के चरित्र निर्माण से लेकर व्यक्ति की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन इन सभी रिश्तों पर कोविड-19 का ग्रहण लग गया है।

एक तो पहले से ही हम उपभोक्तावादी संस्कृति, अपरिपक्वता, व्यक्तिगत आकांक्षा, स्वकेंद्रित विचार, व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि, लोभी मानसिकता, आपसी मनमुटाव और सामंजस्य की कमी के कारण संयुक्त परिवार की संस्कृति छिन्न-भिन्न हो गई है। यहां तक कि एकल परिवार में भी रह रहे लोग कोविड-19 संक्रमण के शिकार होकर मौत को गले लगा रहे हैं। मां-बाप, प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी, दोस्त-रिश्तेदार जैसे संबंधों पर कोविड-19 महामारी का ऐसा हथौड़ा चला है कि सब कुछ सपाट लग रहा है।

कोविड–19 ने हमारी ज़िन्दगी में उथल-पुथल मचा दिया है। लॉकडाउन में स्कूलों का बंद होना और भौतिक दूरी, इन सबका बच्चों पर गहरा असर पड़ रहा है। बच्चों के प्रतिदिन की मनोरंजक गतिविधियों पर प्रतिबंध सा लग गया है। लोगों में आत्महत्या करने की प्रवृति में इजाफा हुआ है। ऐसा समाज शास्त्र को फिर से लिखने की एक नई परंपरा शुरू करनी पड़ेगी। इतिहास गवाह है कि प्राकृतिक संतुलन का समाज शास्त्र हमेशा अपनी गति से चलती रही है। परिवार जीवन की पाठशाला होती है। कोविड-19 के चलते परिवार का बंधन कमजोर हो गया है। समय के बदलाव के साथ बहुत कुछ बदल गया है। आज जयमाल भी दूल्हे-दुल्हन को मास्क पहनाए बिना पूरी नहीं होती? ब्याह के पहले पूरे वैवाहिक स्थल को पूरी तरह से सैनेटाइज किया जाता है।

कोरोना वायरस की विदाई अब मुश्किल है अब उससे लड़ने के हथियार बनाने पड़ेगे। कोविड-19 हमसे तभी डर सकता है, जब डराने का साहस होना, संकल्प हो और फिर से उठ संभलने का हौसला हो। हमने इससे पहले भी कई महामारियां झेली हैं। यह किस खेत की मूली है! कोविड-19 जल्द हमारी ज़िंदगी से विदा होगा लेकिन उससे पहले अपनों की विदाई का ग़म कम नहीं हो रहा है। ये अपनों का बिछड़ना मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख गया है।

विनीत कुमार

(इस ब्लॉग के लेखक विनीत कुमार हैं । फ़िलहाल वे मुंबई स्थित ‘मॉडर्न ग्रुप ऑफ कंपनीज'(MSF) में सोशल मीडिया मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं । विनीत कुमार की टीवी, फ़िल्म और सोशल मीडिया पर गहरी समझ है । इस लेख में विनीत कुमार ने अपनी व्यक्तिगत संवेदनाएं और हाल में सोेशल मीडिया पर हुई घटनाओं के आधार पर अपने विचार व्यक्त किए हैं ।

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