खबर इंडिया की।सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्ग माता-पिता के अधिकारों और उनकी सुरक्षा को लेकर बुधवार को अहम फैसला सुनाया। Supreme Court on Senior Citizens मामले में अदालत ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों को अपने घर में सम्मान, सुरक्षा और गरिमा के साथ रहने का अधिकार है। अगर बेटे या बहू का घर में रहना बुजुर्ग माता-पिता के भरण-पोषण, सुरक्षा या शांतिपूर्ण जीवन में बाधा बन रहा है, तो परिस्थितियों के अनुसार उन्हें घर से बेदखल करने का आदेश दिया जा सकता है।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि बढ़ती उम्र का मतलब अपमान या असुरक्षा के साथ जीवन जीना नहीं है। एक सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कितना सम्मान और सुरक्षा का व्यवहार करता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लखनऊ के विकास नगर स्थित एक मकान से जुड़े विवाद में आया। मामले में 81 वर्षीय बुजुर्ग महिला को कथित तौर पर घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहना पड़ा था। विवाद एसडीएम और जिला मजिस्ट्रेट के आदेश से होता हुआ इलाहाबाद हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
लखनऊ के मकान से जुड़ा है पूरा मामला
Supreme Court on Senior Citizens का यह मामला लखनऊ के विकास नगर में रहने वाले रवि कांत गुप्ता के परिवार से जुड़ा है। मामले में उनकी 81 वर्षीय मां को घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहना पड़ा था।
आरोप था कि उनके पोते के व्यवहार के कारण बुजुर्ग महिला के लिए घर में रहना मुश्किल हो गया था। स्थिति ऐसी बनी कि उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा और वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।
मामले में प्रशासन ने बुजुर्ग महिला की स्थिति को देखते हुए कार्रवाई की। एसडीएम ने 15 नवंबर 2022 को बेटे को मकान से बाहर करने का आदेश दिया। इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट ने 9 अगस्त 2023 को एसडीएम के आदेश को बरकरार रखा और बेटे-बहू को मकान खाली करने का निर्देश दिया।
हालांकि, बेटे और बहू ने इन आदेशों को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने क्यों रद्द किया था बेदखली का आदेश?
बेटे और बहू की याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एसडीएम और जिला मजिस्ट्रेट के आदेशों को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट का कहना था कि Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 के तहत बनाए गए ट्रिब्यूनल को वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति से उसके बच्चों को बेदखल करने का अधिकार नहीं है।
इस फैसले के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। यहां मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून के तहत ट्रिब्यूनल जरूरत पड़ने पर बेटे या बहू को संपत्ति से बाहर करने का आदेश दे सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। अदालत ने कहा कि कानून का उद्देश्य केवल बुजुर्गों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना नहीं है, बल्कि उनकी सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करना भी है।
सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्गों की सुरक्षा पर दिया जोर
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि बुजुर्ग माता-पिता को अपने ही घर में असुरक्षा या अपमान की स्थिति में रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
Supreme Court on Senior Citizens फैसले में अदालत ने माना कि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और भरण-पोषण सुनिश्चित करने के लिए जरूरत पड़ने पर ट्रिब्यूनल बेटे या बहू को मकान से बेदखल करने का आदेश दे सकता है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर पारिवारिक या संपत्ति विवाद में बेटे और बहू को स्वतः घर से बाहर कर दिया जाएगा। बेदखली का आदेश मामले की परिस्थितियों और वरिष्ठ नागरिक की सुरक्षा तथा कल्याण की आवश्यकता को देखते हुए दिया जाएगा।
अदालत का जोर इस बात पर है कि कानून का इस्तेमाल उस उद्देश्य के लिए किया जाए जिसके लिए इसे बनाया गया है।
ट्रिब्यूनल को मिली हैं सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां
सुप्रीम कोर्ट ने 2007 के कानून की धाराओं की भी व्याख्या की। अदालत ने बताया कि कानून की धारा 7 के तहत मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं।
धारा 8 के तहत इन ट्रिब्यूनल को कुछ मामलों में सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां प्राप्त हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन प्रावधानों को कानून के उद्देश्य के साथ पढ़ना जरूरी है।
अगर किसी वरिष्ठ नागरिक की सुरक्षा और भरण-पोषण सुनिश्चित करने के लिए परिवार के किसी सदस्य को घर से हटाना जरूरी है, तो ट्रिब्यूनल आवश्यक और सहायक आदेश जारी कर सकता है।
अदालत ने धारा 27 का भी उल्लेख किया, जो सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, इन सभी प्रावधानों की ऐसी व्याख्या होनी चाहिए जिससे वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और कल्याण का उद्देश्य कमजोर न हो।
2021 के फैसले का भी किया गया उल्लेख
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर (2021) के निर्णय का भी हवाला दिया। इस मामले में भी वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और संपत्ति से जुड़े अधिकारों पर विचार किया गया था।
अदालत ने पहले के फैसले के सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि यदि वरिष्ठ नागरिक के भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए आवश्यक हो, तो ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश दे सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने समटोला देवी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2025) और कमलकांत मिश्रा बनाम एडिशनल कलेक्टर (2025) जैसे बाद के मामलों का भी उल्लेख किया। इन मामलों में भी वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े इसी कानूनी सिद्धांत को दोहराया गया था।
इससे साफ है कि मौजूदा फैसला वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को लेकर पहले दिए गए न्यायिक फैसलों की ही कड़ी को आगे बढ़ाता है।
क्या है 2007 का Senior Citizens Act?
Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 यानी माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम बुजुर्गों को कानूनी सुरक्षा और सहायता देने के लिए बनाया गया है।
इस कानून के तहत 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के व्यक्ति को वरिष्ठ नागरिक माना जाता है। कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बुजुर्गों को अपनी बुनियादी जरूरतों और सुरक्षा के लिए पूरी तरह असहाय स्थिति में न रहना पड़े।
उम्र बढ़ने के साथ कई वरिष्ठ नागरिक आर्थिक या पारिवारिक रूप से अपने बच्चों पर निर्भर हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में अगर उन्हें ही उपेक्षा, असुरक्षा या प्रताड़ना का सामना करना पड़े, तो कानून उनके संरक्षण के लिए व्यवस्था करता है।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले में इसी सुरक्षात्मक उद्देश्य पर विशेष जोर दिया गया है।
बुजुर्ग माता-पिता के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
Supreme Court on Senior Citizens का यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में बुजुर्ग माता-पिता और उनके बच्चों के बीच संपत्ति तथा रहने की जगह को लेकर विवाद सामने आते रहते हैं।
कई मामलों में माता-पिता के पास अपना घर होने के बावजूद उन्हें परिवार के सदस्यों के व्यवहार के कारण मानसिक दबाव या असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में केवल संपत्ति का मालिक होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि बुजुर्ग व्यक्ति की वास्तविक सुरक्षा और शांतिपूर्ण जीवन भी महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह संदेश मिलता है कि वरिष्ठ नागरिकों को अपने ही घर में सम्मान और सुरक्षा के साथ रहने का अधिकार है।
हालांकि, हर मामले में बेदखली का आदेश स्वतः लागू नहीं होगा। संबंधित प्राधिकारी को मामले के तथ्यों, वरिष्ठ नागरिक की स्थिति और सुरक्षा की जरूरत को ध्यान में रखना होगा।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला senior citizen rights in India के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि बुजुर्ग माता-पिता को केवल उम्र बढ़ने के कारण अपमान, उपेक्षा या असुरक्षा के साथ जीवन बिताने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। जरूरत पड़ने पर कानून उनकी सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए बेटे या बहू को घर से बाहर करने की अनुमति देता है।














