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Supreme Court Rape Case:पहले सेक्स करके ब्रेकअप कर लो फिर रेप का आरोप लगा दो… सुप्रीम कोर्ट बोला- हर टूटे रिश्ते को रेप केस में बदलना गलत; आरोपी बरी

Supreme Court Rape Case: खबर इंडिया की।सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार, 30 अक्टूबर को एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि दो व्यस्क लोगों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को केवल रिश्ता टूट जाने के बाद रेप का अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी रिश्ते का खत्म होना अपने आप में आपराधिक मामला दर्ज कराने का आधार नहीं बन सकता। हालांकि, यदि शुरुआत से ही शादी का झूठा वादा करके या धोखे से शारीरिक संबंध बनाए गए हों, तो मामला अलग हो सकता है।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने यह टिप्पणी एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें एक व्यक्ति पर रेप और धोखाधड़ी के आरोप लगाए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने मामले के तथ्यों पर विचार करने के बाद आरोपी को इन आरोपों से मुक्त कर दिया।

अदालत ने कहा कि आपसी प्रेम और सहमति से चल रहे रिश्ते में बने शारीरिक संबंधों को बाद में केवल इसलिए अपराध नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि दोनों के बीच संबंध खराब हो गए या रिश्ता खत्म हो गया। हर असफल रिश्ते को रेप के मामले में बदलना न्यायिक प्रक्रिया के उद्देश्य के खिलाफ है।

इस फैसले में अदालत ने पुरुष और महिला दोनों के अधिकारों, आपसी सहमति और यौन अपराधों से जुड़े कानूनों के सही इस्तेमाल पर जोर दिया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि वास्तविक यौन हिंसा, जबरदस्ती और धोखे के मामलों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों सुनाया यह फैसला?

इस मामले में केरल निवासी संतोष कुमार एनपी ने अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई को चुनौती दी थी। मामला रेप और धोखाधड़ी के आरोपों से जुड़ा था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, महिला का आरोप था कि आरोपी ने अपनी पहली शादी की जानकारी छिपाई थी और उसे अपने वैवाहिक संबंधों की वास्तविक स्थिति के बारे में गुमराह किया था।

महिला का कहना था कि आरोपी ने उसे विश्वास दिलाया कि उनके बीच हुआ विवाह कानूनी रूप से वैध है। आरोप था कि पहली शादी बरकरार होने के बावजूद आरोपी ने दूसरी शादी की और महिला के साथ संबंध बनाए।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध तथ्यों पर विचार करते हुए आरोपी को आरोपों से मुक्त कर दिया। अदालत ने इस दौरान व्यापक टिप्पणी की कि किसी सहमति वाले रिश्ते के टूटने के बाद पुराने शारीरिक संबंधों को अपने आप रेप का अपराध नहीं माना जा सकता।

यहां यह समझना जरूरी है कि अदालत ने धोखे से हासिल की गई सहमति को कानूनी संरक्षण नहीं दिया है। यदि किसी व्यक्ति ने शुरुआत से ही धोखा देने की नीयत से झूठा वादा किया और उसी आधार पर दूसरे व्यक्ति की सहमति हासिल की, तो कानून के तहत उस मामले की अलग जांच हो सकती है।

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सुप्रीम कोर्ट की 5 प्रमुख टिप्पणियां

1. रिश्ता खत्म करना किसी व्यक्ति का अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी पुरुष को सिर्फ इसलिए आपराधिक मामले में नहीं फंसाया जा सकता, क्योंकि उसने आपसी सहमति से चल रहे रिश्ते को खत्म करने का फैसला किया है। किसी भी व्यक्ति को अपनी इच्छा से रिश्ता जारी रखने या उससे बाहर निकलने का अधिकार है।

अदालत के मुताबिक, पहले किसी रिश्ते में रहना और बाद में उससे बाहर निकलना अपने आप में धोखाधड़ी नहीं है। किसी व्यक्ति को रेप के आरोप का डर दिखाकर जबरदस्ती रिश्ते में बने रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

2. रेप कानून का इस्तेमाल बदला लेने के लिए नहीं होना चाहिए

अदालत ने कहा कि रेप जैसे गंभीर अपराध से जुड़े कानूनों का इस्तेमाल किसी को परेशान करने या व्यक्तिगत बदला लेने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

बेंच ने सहमति से बने रिश्ते और शुरुआत से ही धोखे या जबरदस्ती के आधार पर बनाए गए रिश्ते के बीच अंतर करने की जरूरत बताई। केवल रिश्ता टूटने या शादी नहीं हो पाने से पहले की सहमति को अपराध नहीं माना जा सकता।

3. शुरुआत से झूठा वादा करना अलग अपराध हो सकता है

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर मामले में आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती। यदि यह साबित होता है कि किसी पुरुष ने शुरुआत से ही शादी करने का इरादा नहीं रखा था और केवल शारीरिक संबंध बनाने के उद्देश्य से महिला को झूठा भरोसा दिया था, तो मामला अलग होगा।

ऐसी स्थिति में यह जांचना जरूरी है कि महिला की सहमति वास्तव में धोखे या गलत जानकारी के कारण हासिल की गई थी या नहीं। यानी शादी का वादा पूरा नहीं होना और शुरुआत से ही झूठा वादा करना, दोनों कानूनी रूप से अलग परिस्थितियां हैं।

4. महिलाओं की परेशानी और सामाजिक दबाव को भी समझना जरूरी

अदालत ने महिलाओं की सामाजिक परिस्थितियों और उनकी परेशानियों पर भी ध्यान दिलाया। कई महिलाएं यौन हिंसा की शिकायत परिवार की इज्जत, सामाजिक बदनामी और समाज के डर से दर्ज नहीं करा पातीं।

इसलिए वास्तविक यौन उत्पीड़न और हिंसा के मामलों को गंभीरता से लेना जरूरी है। महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और उनके शारीरिक स्वायत्तता के अधिकार की रक्षा करना न्याय व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

5. वास्तविक यौन हिंसा के मामलों में सख्त कार्रवाई हो

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेप एक गंभीर अपराध है। ऐसे मामलों में जहां यौन हिंसा, जबरदस्ती या सहमति में धोखाधड़ी के पर्याप्त आधार हों, वहां कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि जांच और कानूनी कार्रवाई तथ्यों तथा उपलब्ध सबूतों के आधार पर होनी चाहिए। न तो वास्तविक पीड़ितों की शिकायतों को नजरअंदाज किया जाना चाहिए और न ही आपसी सहमति से बने रिश्तों को बिना पर्याप्त आधार के आपराधिक मामला बनाया जाना चाहिए।

आपसी सहमति और झूठे शादी के वादे में क्या है अंतर?

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आपसी सहमति और धोखे के बीच अंतर को समझना है। अदालत के अनुसार, यदि दो व्यस्क अपनी इच्छा से किसी रिश्ते में आते हैं और शारीरिक संबंध बनाते हैं, तो बाद में रिश्ता टूटने या शादी नहीं होने के कारण उन संबंधों को अपने आप रेप नहीं कहा जा सकता।

लेकिन यदि किसी व्यक्ति ने शुरुआत से ही शादी का झूठा वादा किया था और उसका मकसद केवल शारीरिक संबंध बनाना था, तो ऐसे मामले में सहमति की वैधता पर सवाल उठ सकता है।

इसलिए हर मामले का फैसला उसके अलग-अलग तथ्यों, परिस्थितियों और सबूतों के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल ब्रेकअप या शादी से इनकार को रेप का स्वतः प्रमाण नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या होगा असर?

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनमें असफल प्रेम संबंधों के बाद रेप और धोखाधड़ी के आरोप लगाए जाते हैं। इससे अदालतों को आपसी सहमति से बने रिश्तों और शुरुआत से धोखे पर आधारित संबंधों के बीच अंतर करने में मदद मिलेगी।

हालांकि, इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि शादी का झूठा वादा करके शारीरिक संबंध बनाने वाले व्यक्ति को हर परिस्थिति में राहत मिल जाएगी। यदि शुरुआत से धोखा देने की मंशा और सहमति को प्रभावित करने वाले तथ्यों के प्रमाण मिलते हैं, तो कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है।

अदालत का मुख्य संदेश यही है कि रिश्ते का टूटना अपने आप में अपराध नहीं है, लेकिन धोखे, जबरदस्ती और यौन हिंसा को भी किसी सामान्य प्रेम संबंध का हिस्सा बताकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, महिलाओं की गरिमा और आपराधिक कानून के उचित इस्तेमाल के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया है।

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