उमाकांत त्रिपाठी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए संसदीय दल की मीटिंग में झारखंड के गोड्डा से सांसद निशिकांत दूबे की खुलकर तारीफ की. पीएम ने कहा कि निशिकांत दूबे संसद सत्र शुरू होने से लेकर आखिर तक मौजूद रहते हैं. हर महत्वपूर्ण डिस्कशन में भाग लेते हैं और पूरी रिसर्च के साथ बहस करते हैं. यह मिसाल है कि संसद में कैसे प्रभावी योगदान दिया जा सकता है. सभी सांसदों को उनसे सीखना चाहिए. पीएम मोदी ने ये बातें 3 फरवरी 2026 की मीटिंग में कही जहां बजट सेशन और संसदीय कार्यों पर चर्चा हुई. जानकारों की नजर में पीएम मोदी की निशिकांत दुबे को लेकर की गई यह टिप्पणी केवल किसी एक सांसद की सराहना नहीं, बल्कि संसदीय लोकतंत्र की बुनियादी जिम्मेदारियों की याद दिलाने वाला संदेश है.
संसद में मौजूद रहना क्यों मायने रखता है
जानकार बताते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने जिस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया वह थी- संसद में सांसदों की उपस्थिति. उन्होंने कहा कि निशिकांत दुबे संसद सत्र शुरू होने से लेकर अंत तक सदन में मौजूद रहते हैं. संसदीय लोकतंत्र में उपस्थिति केवल औपचारिकता नहीं होती. यह जनता के प्रति जवाबदेही का पहला कदम है. जिस सांसद ने जनता का प्रतिनिधित्व करने का दायित्व लिया है, उनका सदन में रहना ही उसकी प्रतिबद्धता को बताता है. पीएम मोदी का यह संदेश साफ है कि संसदीय लोकतंत्र में संसद में खाली कुर्सियां नहीं सक्रिय जनप्रतिनिधि चाहिए.
बहस और भागीदारी से बनती है संसद की ताकत
पीएम मोदी के शब्दों को और गहराई से समझें तो निशिकांत दुबे की चर्चा करते हुए उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि संसद की गरिमा केवल भाषणों से नहीं, बल्कि सार्थक बहस और विमर्श से बनती है. प्रधानमंत्री ने निशिकांत दुबे की तारीफ करते हुए यह भी कहा कि वे हर महत्वपूर्ण चर्चा में हिस्सा लेते हैं. बहस करना संसदीय अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी है. जब सांसद चर्चा में भाग लेते हैं, सवाल पूछते हैं और तर्क रखते हैं, तभी जन कल्याणकारी नीतियां बनती हैं और बेहतर परिणाम सामने आते हैं. पीएम मोदी का यह संदेश उन सांसदों के लिए भी है जो संसद को बहस का मंच नहीं केवल उपस्थिति रजिस्टर समझ लेते हैं.
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प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी रेखांकित (अंडरलाइन) किया कि निशिकांत दुबे हर बहस से पहले पूरी रिसर्च करके आते हैं. पीएम मोदी यह टिप्पणी मौजूदा राजनीति में बेहद अहम है. संसद में भावनात्मक भाषणों से ज्यादा तथ्य, आंकड़े और अध्ययन की जरूरत होती है. रिसर्च आधारित बहस न सिर्फ सरकार को मजबूत करती है, बल्कि विपक्ष को भी जिम्मेदार बनाती है. पीएम मोदी का यह संदेश बताता है कि संसद में प्रभाव बनाने का रास्ता शोर नहीं बल्कि पुख्ता रिसर्च और स्पीच की तैयारी है.














