उमाकांत त्रिपाठी।
तमिलनाडु में मकर संक्रांति पर पोंगल उत्सव मनाया जाता है। जल्लीकट्टू इसका ही एक हिस्सा है। मदुरै के अवनियापुरम में मट्टू पोंगल पर शुरू हुए पहले दिन के खेल में दो पुलिस कर्मियों समेत 45 लोग घायल हो गए। गंभीर रूप से घायल 9 लोगों को इलाज के लिए मदुरै के राजाजी अस्पताल में रेफर किया गया है।
अवनियापुरम में चल रहे जल्लीकट्टू में लगभग 1000 सांडों और 600 खिलाड़ी हिस्सा ले रहे हैं। सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी को अवनियापुरम जल्लीकट्टू उत्सव में एक कार दी जाएगी। इस बार केवल पास वाले बैल मालिकों, काबू पाने वालों को ही अवनियापुरम जल्लीकट्टू में प्रवेश की अनुमति दी गई है।
अवनियापुरम के बाद 16 जनवरी को पलामेडु और 17 जनवरी को अलंगनल्लूर में जल्लीकट्टू का खेल होगा।
क्या है जल्लीकट्टू का खेल
जल्लीकट्टू तमिल शब्द है। यह ‘कालीकट्टू’ से बना है। ‘काली’ का मतलब कॉइन (Coin) यानी सिक्का और ‘कट्टू’ का मतलब बांधना होता है। पहले बैलों के सींग पर सिक्कों की पोटली बांध दी जाती थी और जीतने वाले को इनाम में वहीं पोटली मिलती थी। इसमें एक एंट्री गेट से बैलों को छोड़ा जाता है। जो शख्स 15 मीटर के दायरे में बैल को पकड़ लेता है, वह विजेता हो जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल कहा था- जल्लीकट्टू सांस्कृतिक विरासत
2014 में सुप्रीम कोर्ट ने इस खेल पर रोक लगा दी थी। इसके बाद तमिलनाडु सरकार ने केंद्र से इस खेल को जारी रखने के लिए अध्यादेश लाने की मांग की। 2016 में केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी की और कुछ शर्तों के साथ जल्लीकट्टू के आयोजन को हरी झंडी मिल गई।
मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जहां पशु क्रूरता अधिनियम में बदलावों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई। इस बार पेटा ने फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका लगाई थी, लेकिन SC ने मई 2023 में तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र में होने वाली बैलों की परंपरागत दौड़ पर रोक लगाने से इंकार कर दिया।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि तमिलनाडु में जल्लीकट्टू पिछली एक सदी से होता आ रहा है। जब विधानसभा ने यह घोषित कर दिया कि जल्लीकट्टू तमिलनाडु की सांस्कृतिक विरासत है, तब हम इस पर कोई अलग नजरिया नहीं रख सकते हैं।
जल्लीकट्टू में बैल मरने पर खिलाड़ी सिर मुंडवाते हैं, मृत्युभोज देते हैं
तमिलनाडु के लोग बैल को भगवान शिव का वाहन मानते हैं। उसकी पूजा करते हैं। उनके लिए बैल भाई-बाप की तरह है। उसके मरने के बाद रिश्तेदारों को शोक संदेश भेजते हैं। उसका मृत शरीर फूलों से सजाते हैं। इंसानों की तरह जनाजा निकालते हैं और पवित्र जगह पर दफनाते हैं।
घर लौटने के बाद अपना सिर मुंडवाते हैं। गांव के लोगों को मृत्यु भोज देते हैं। कुछ दिनों बाद उस बैल का मंदिर भी बनाते हैं और हर साल उसकी पूजा करते हैं।
श्रीलंका में भी पहली बार हुआ जल्लीकट्टू का आयोजन
तमिलनाडु का फेमस गेम जलीकट्टू श्रीलंका में पहली बार आयोजित हुआ है। इसमें 100 से ज्यादा सांडों के हिस्सा लेने की उम्मीद है। लोगों की सुरक्षा के लिए मैदान में 100 से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात कर दिए गए हैं।















