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अंतरराष्ट्रीय योग दिवस: विद्यार्थी जीवन में योगा का महत्व

“संजीवनी समान है विद्यार्थी जीवन हेतु – योगा”

“योगा” एक ऐसा सकारात्मक शब्द है कि जिसे सुनते ही मनुष्य के मन में उत्साह एवं एवं सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होने लग जाता है और हो भी क्यों न जो भी लोग “योग क्रिया” के बारे में उचित जानकारी रखते हैं वे भली भाँति इससे होने वाले तत्काल एवं दूरगामी लाभों से भी परिचित होते हैं। योग क्रिया आदि-अनादि काल से चलती चली आ रही है और हम सब वास्तव में बहुत ही सौभाग्यशाली हैं कि हम उस देश के वासी हैं कि जहाँ पर “योग क्रिया” बहुत ही प्राचीन समय से चलती चली आ रही है हमारे इसी देश में ऋषि-मुनियों ने योग क्रिया के माध्यम से अपने शरीर को चिरकाल तक युवा रहने वाला, आलस्य रहित, स्फूर्तिवान बना लिया था और आज भी बहुत से ऐसे तपस्वी मौजूद हैं कि जो सदैव ही बर्फ से आच्छादित रहने वाले भारत के सिरमौर हिमालय पर्वत पर योग क्रियाओं में लीन रहते हुए दिखाई दे जायेंगे ।


अब जब बात विद्यार्थी जीवन के संदर्भ में आ जाए तो विद्यार्थी जीवन हेतु योग क्रियाएँ उतनी ही महत्वपूर्ण होती हैं कि जैसे मरुभूमि में जल की आवश्यकता वास्तव में आज वर्तमान समय में देखा जाए तो विद्यार्थियों के लिए योग बहुत ही लाभदायक माना गया है इससे बच्चों के मन-मस्तिष्क में स्थिरता आती है और बच्चों को अपनी पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करने में भी पूर्ण रूप से सहायता मिलती है। योग के चमत्कार को तो पूरी दुनिया ने स्वीकार किया है इसी वजह से दुनिया के अधिकांश देशों में योग शिक्षा को अनिवार्य किया गया है। योग के प्रभाव को देखते हुए आज चिकित्सक एवं वैज्ञानिक योग के अभ्यास की सलाह देते हैं। योग साधु-संतो के लिए ही नहीं वरन् समस्त मानव जाति के लिए आवश्यक है, विशेषकर छात्र जीवन के लिए तो बहुत ही आवश्यक है।क्यों छात्र जीवन ही भविष्य तय करता है।


और वैसे भी योग तो सभी को समान रूप से लाभ प्रदान करता है इसलिए योग का अभ्यास तो सभी को करना चाहिए और हाँ एक बात गौर करने वाली और ये कि योग शिक्षा जितनी कम उम्र से ली जाये, उतना ही शरीर को ज्यादा लाभ पहुँचाती है और वैसे भी बच्चों का शरीर बड़ों की तुलना में ज्यादा लचकदार होता है इसलिए बच्चे चीजों को जल्दी और आसानी से ग्रहण कर ले जाते हैं। आज की तुलना में पहले के बच्चों के पास घर से बाहर खेलने के कई मौके होते थे लेकिन आज के बच्चे गैजेट्स आदि के सिवाय और कहीं अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते जिसके कारण कारण बच्चों में शिक्षा के प्रति भी उदासीनता देखी जाने लगी है, जिसका मूल कारण है तन-मन का अस्वस्थ होना। हम सब ये भी बखूबी जानते हैं कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ शिक्षा का ही निवास सम्भव है और यह काम योग के मार्फ़त ही संभव है। योग से शरीर को रोगों से मुक्ति मिलती है और मन को शक्ति देता है। योग बच्चों के मन-मस्तिष्क को उसके कार्य के प्रति जागरूक करता है।


आजकल के बच्‍चों को पढ़ाई और प्रतियोगिताओं का बोझ तो बचपन से ही उठाना पड़ता है और बचपन से ही उनमें जीत की ऐसी भावना भर दी जाती है कि जब वे हारते हैं तो वे ख़ुद की हार को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं और अपना आत्मविश्वास खो बैठते हैं साथ ही अपने दिल-दिमाग से भी कमजोर हो जाते है, इसलिए विद्यार्थियों को प्रारंभ से ही अनिवार्य तौर से योग शिक्षा देना बहुत जरूरी है। योग से बच्चों की सहनशीलता बढ़ती है और मन शक्तिशाली होता है। योगाभ्यास से मन-मस्तिष्क का संतुलन बना रहता है जिससे दुःख-दर्द-समस्याओँ को सहन करने की शक्ति प्रदान होती है। योग विद्यार्थियों को आगे बढ़ने की और आत्मविश्वास को बढ़ाने की शक्ति देता है।


इस प्रकार से हम योग के महत्व को तो भलीभाँति ही समझ गए होंगें साथ ही इस बात को भी समझ गए होंगें कि ये किस प्रकार से विद्यार्थी जीवन हेतु संजीवनी की भाँति कार्य करता है। आज प्रत्येक विद्यालय को चाहिए कि वे अपने यहाँ प्रशिक्षित योग अध्यापक को अनिवार्य तौर पर रखकर विद्यार्थियों हेतु योग शिक्षा का भी प्रबन्ध करें।

लेखक: उमाकांत त्रिपाठी

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