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हिंदी दिवस पर गृहमंत्री का खास संदेश, अमित शाह ने देशवासियों को मैसेज के साथ दी बधाई

उमाकांत त्रिपाठी।हिंदी उन भाषाओं में शुमार है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा बोली और समझी जाती है. जनमानस की भाषा है और उन्होंने इसे देश की राष्ट्रभाषा बनाने की सिफारिश भी की थी. हिंदी को 14 सितंबर, 1949 को राजभाषा का दर्जा दिया गया, लिहाजा इस दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह हिंदी दिवस पर खास संदेश दिया है.

आप सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं-शाह

गृह मंत्री शाह ने एक्स पर कहा,कि- प्रिय देशवासियों, आप सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं. भारत मूलतः एक भाषा-प्रधान देश है. हमारी भाषाएं सदियों से संस्कृति, इतिहास, परंपराओं, ज्ञान-विज्ञान, दर्शन और अध्यात्म को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाने का सशक्त माध्यम रही हैं. हिमालय की ऊंचाइयों से लेकर दक्षिण के समुद्र तटों तक, मरुभूमि से लेकर जंगलों और गांव की चौपालों तक, भाषाओं ने हर परिस्थिति में संवाद और अभिव्यक्ति के जरिए समाज को संगठित किया है.

मिलकर चलो, मिलकर सोचो, मिलकर बोलो-शाह
शाह ने एक्स पर कहा,कि- भारतीय भाषाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने हर वर्ग और समुदाय को अभिव्यक्ति का अवसर दिया. चाहे वह पूर्वोत्तर का बीहू हो, तमिलनाडु की ओवियालू की आवाज़, पंजाब के लोहड़ी गीत, बिहार के विद्यापति की पदावली, बंगाल के बाउल संतों के भजन, या भिखारी ठाकुर की ‘बिदेशिया’ — इन सभी ने हमारी संस्कृति को जीवंत और लोककल्याणकारी बनाया है. गृह मंत्री शाह ने कहा,कि- भाषाएं एक-दूसरे की सहचर बनकर एकता के सूत्र में बंधी हैं. संत तिरुवल्लुवर, कृष्णदेवराय, सुब्रमण्यम भारती, गोस्वामी तुलसीदास, संत कबीर, सूरदास, श्रीमंत शंकरदेव, महापुरुष माधवदेव और भूपेन हजारिका — इन सभी की रचनाएं भारत के हर कोने में सम्मानित और गुनगुनाई जाती हैं.

 

शाह ने कहा कि- गुलामी के कठिन दौर में भी भारतीय भाषाएं प्रतिरोध की आवाज बनीं. आजादी के आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने में भाषाओं की अहम भूमिका रही. वन्दे मातरम् और जय हिंद जैसे नारे हमारी भाषाई चेतना से ही उपजे और स्वतंत्र भारत के स्वाभिमान के प्रतीक बने. शाह कहा कि- 14 सितम्बर 1949 को देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को राजभाषा के रूप में अंगीकृत किया गया. संविधान के अनुच्छेद 351 में यह दायित्व सौंपा गया कि हिंदी का प्रचार-प्रसार हो और वह भारत की सामासिक संस्कृति का प्रभावी माध्यम बने.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले एक दशक में भारतीय भाषाओं और संस्कृति के पुनर्जागरण का स्वर्णिम कालखंड आया है. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी और भारतीय भाषाओं में संवाद कर उन्होंने भाषाओं का स्वाभिमान बढ़ाया है. आजादी के अमृत काल में मोदी द्वारा लिए गए पंच प्रणों में भाषाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है. हमें अपनी संवाद और संपर्क भाषा के रूप में भारतीय भाषाओं को अपनाना चाहिए.

 

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