उमाकांत त्रिपाठी।बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं और सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने पहले चरण की सीटों के लिए नामांकन प्रक्रिया शुरू होने से पहले सीट शेयरिंग फॉर्मूले का ऐलान कर दिया है. एनडीए की सीट शेयरिंग में पशुपति पारस खाली हाथ रह गए हैं तो वहीं उपेंद्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी की पार्टियों को एक-एक सीटें मिल सकी हैं. लोकसभा चुनाव के लिए एनडीए के इस सीट शेयरिंग फॉर्मूले में भविष्य की सियासत के लिहाज से बड़े संदेश भी छिपे हैं. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इस फॉर्मूले के जरिए कौन से बड़े संदेश दिए हैं।
विजय सिंह को बनाया गया नया डिप्टी सीएम
बिहार में बीजेपी न सिर्फ इस लोकसभा चुनाव बल्कि आगे के विधानसभा चुनाव की अलग बिसात भी साथ-साथ बिछाती जा रही है. नीतीश के साथ औऱ नीतीश से आगे भी कैसे बीजेपी अपने दम पर बिहार में तैयार हो? इस लिहाज से चिराग पासवान पर खुलकर दांव खेल दिया है. इसकी पहली झलक तब मिली जब ओबीसी समुदाय से आने वाले सम्राट चौधरी को बीजेपी ने नीतीश की नई सरकार में डिप्टी सीएम का पद दिया वहीं सवर्ण तबके में बैलेंस बनाने के लिए विजय सिन्हा को दूसरा डिप्टी सीएम बनाया।
बीजेपी अध्यक्ष सम्राट चौधरी बोले
बिहार में एनडीए का सीट शेयरिंग फॉर्मूला बिहार में बीजेपी की बदलती भूमिका का, बदलते तेवर का संकेत भी है. नीतीश कुमार के फिर से साथ आने, एनडीए सरकार में डिप्टी सीएम बनने के ठीक बाद बिहार बीजेपी के अध्यक्ष सम्राट चौधरी ने साफ कहा था कि हमारा लक्ष्य बिहार में बीजेपी की सरकार है. लोकसभा चुनाव के सीट शेयरिंग फॉर्मूले में इसकी झलक भी दिख रही है.
बिहार में बीजेपी बनेगी बड़ा भाई
बिहार की सियासत में अब तक जेडीयू ही एनडीए में बड़े भाई की भूमिका में रही है. 2009 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू ने बिहार की 25 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 20 पर पार्टी जीती थी. बीजेपी ने तब 15 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और 12 जीती थीं. इससे पहले 2004 के चुनाव में जेडीयू ने 24 और बीजेपी ने 16 सीटों पर चुनाव लड़ा था. 2019 के चुनाव में दोनों दल फिर साथ आए और तब बीजेपी-जेडीयू ने बराबर-बराबर सीटों पर चुनाव लड़ा. बीजेपी इस बार 17 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी. नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) 16 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. दोनों ही दलों के बीच देखने में भले ही एक सीट का अंतर है लेकिन बीजेपी पहली बार बड़े भाई की भूमिका में आ चुकी है.
चिराग पासवान-नीतीश के एक-दूसरे के साथ नहीं है अच्छे संबंध
चिराग पासवान के रिश्ते नीतीश के साथ तल्ख रहे हैं. जेडीयू की गठबंधन में वापसी के बाद चिराग को पहले इतनी तवज्जो और अब सीट शेयरिंग में बीजेपी का अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना, इन सबको नीतीश कुमार की घटी बारगेन पावर से जोड़ा जा रहा है. 2019 चुनाव के लिए सीट शेयरिंग में नीतीश की बारगेन पावर दिखी भी थी.
साल 2014 के चुनाव में बीजेपी अकेले लड़कर 22 सीटें जीती थी और नीतीश की जेडीयू दो सीटों पर सिमट गई थी. दोनों दल जब साथ आए, नीतीश अधिक नहीं तो बीजेपी के बराबर सीटों की मांग पर अड़ गए. बीजेपी को यह मांग माननी पड़ी और अपनी जीती सीटों में से पांच सीटें सहयोगियों के लिए छोड़नी पड़ी थीं. तब दो सांसदों वाली जेडीयू और 22 सांसदों वाली बीजेपी, दोनों ही दलों ने चुनाव में 17-17 सीटों पर उम्मीदवार उतारे.
बीजेपी ने जताया चिराग पासवान पर विश्वास
बीजेपी के साथ सीट शेयरिंग की टेबल पर चिराग पासवान अपनी बात मनवाने में सफल रहे. चिराग पासवान की पार्टी को एनडीए में पांच सीटें मिली हैं. यह इस बात का संदेश है कि बीजेपी ने उसे तवज्जो दी है जो पार्टी और परिवार टूटने के बाद भी जमीन पर लगातार एक्टिव रहा.
बिहार के वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश अश्क ने कहा कि बीजेपी ने चिराग के आजमाए चेहरे पर भरोसा किया है. रामविलास पासवान के निधन को अभी एक साल भी नहीं हुए थे कि पशुपति पारस ने चिराग को पार्टी के अध्यक्ष और अन्य सभी पदों से हटा नाम-निशान पर दावा कर दिया था. एलजेपी के कोर वोटर पासवान समाज में इसका गलत संदेश गया और चिराग को सहानुभूति भी मिली. चिराग अपनी रैलियों में भीड़ जुटाकर यह संदेश देने में भी सफल रहे कि पासवान उनमें ही रामविलास का वारिस देखते हैं. पासवान समाज की कुल आबादी करीब साढ़े पांच फीसदी है.














