खबर इंडिया की।premanand Maharaj: गंगा यमुना में सिक्के डालना सही है या गलत—यह सवाल वर्षों से लोगों के मन में रहा है। भारत में गंगा, यमुना और अन्य पवित्र नदियों में सिक्के डालकर मनोकामना मांगने की परंपरा काफी पुरानी है। कई लोग मानते हैं कि ऐसा करने से उनकी इच्छा पूरी होती है और उन्हें पुण्य की प्राप्ति होती है। लेकिन क्या वास्तव में शास्त्रों में इसका कोई उल्लेख मिलता है? इस विषय पर वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज ने विस्तार से अपनी राय दी है।
हाल ही में एक श्रद्धालु ने प्रेमानंद महाराज से पूछा कि गंगा या यमुना में सिक्के डालने की परंपरा कितनी उचित है और क्या इससे कोई धार्मिक लाभ मिलता है। इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने जो कहा, वह लाखों श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है।
नदियों में सिक्के डालने की परंपरा कहां से आई?
भारत समेत दुनिया के कई देशों में जल स्रोतों में सिक्के डालने की परंपरा सदियों पुरानी है। लोग कुओं, झरनों, तालाबों और नदियों में सिक्के डालकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति की कामना करते रहे हैं। समय के साथ यह परंपरा धार्मिक आस्था से जुड़ गई और कई लोग इसे शुभ मानने लगे।
हालांकि धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों में गंगा या यमुना में सिक्के डालने को लेकर कोई स्पष्ट निर्देश नहीं मिलता। अधिकांश विद्वान इसे व्यक्तिगत श्रद्धा और विश्वास का विषय मानते हैं, न कि किसी धार्मिक नियम का हिस्सा।
प्रेमानंद महाराज ने क्या कहा?
प्रेमानंद महाराज ने इस सवाल का जवाब देते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति गंगा या यमुना की सेवा करना चाहता है, तो उसे सिक्के डालने के बजाय जीवों के हित में काम करना चाहिए।उन्होंने कहा कि- यदि किसी के पास एक रुपया है तो वह उससे आटा खरीद सकता है। उस आटे की छोटी-छोटी गोलियां बनाकर नदी में डालने से मछलियां, कछुए और अन्य जलीय जीव भोजन प्राप्त कर सकेंगे। इससे वास्तविक लाभ होगा।
महाराज के अनुसार, गंगाजी या यमुनाजी में रुपये या सिक्के डालने से कोई विशेष धार्मिक फल नहीं मिलता और इसके लिए किसी शास्त्र में आदेश भी नहीं दिया गया है। उन्होंने इसे मनमानी परंपरा बताते हुए कहा कि श्रद्धा का अर्थ केवल रस्म निभाना नहीं बल्कि समाज और प्रकृति के लिए उपयोगी कार्य करना भी है।
सिक्के डालने से बढ़ रहा है प्रदूषण
प्रेमानंद महाराज ने यह भी कहा कि नदियों में बड़ी संख्या में सिक्के फेंके जाने से जल प्रदूषण की समस्या बढ़ती है। उन्होंने बताया कि कई घाटों पर छोटे बच्चे और युवक चुंबक की मदद से नदी में पड़े सिक्कों को निकालते रहते हैं।
उनका कहना था कि जब सिक्के बाद में निकाल ही लिए जाते हैं, तो इससे न तो दान का उद्देश्य पूरा होता है और न ही किसी का कल्याण होता है। इसके विपरीत नदी का प्राकृतिक संतुलन प्रभावित होता है।
आज जब देश में गंगा और यमुना को स्वच्छ रखने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, तब श्रद्धालुओं की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे ऐसी गतिविधियों से बचें जो नदी को प्रदूषित कर सकती हैं।
दान करना है तो जरूरतमंदों की मदद करें
प्रेमानंद महाराज ने श्रद्धालुओं को सलाह देते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति 100 रुपये दान करना चाहता है, तो उसे नदी में फेंकने के बजाय किसी जरूरतमंद की सहायता करनी चाहिए।उन्होंने कहा कि इन पैसों से गाय के लिए चारा खरीदा जा सकता है, किसी गरीब को भोजन कराया जा सकता है या किसी बीमार व्यक्ति की मदद की जा सकती है। ऐसा करने से दान का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा और समाज को भी लाभ मिलेगा।उनके अनुसार धर्म का मूल उद्देश्य करुणा, सेवा और परोपकार है। यदि श्रद्धा के साथ विवेक भी जुड़ जाए तो उसका परिणाम और अधिक सकारात्मक होता है।
आस्था के साथ विवेक भी है जरूरी
धार्मिक परंपराएं समाज की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा होती हैं, लेकिन समय के साथ उनका सही अर्थ समझना भी आवश्यक है। प्रेमानंद महाराज का संदेश यही है कि केवल परंपरा का पालन करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि उससे समाज, पर्यावरण और जीव-जंतुओं को लाभ हो रहा है या नहीं।
गंगा और यमुना करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र हैं। ऐसे में उनकी स्वच्छता और संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी श्रद्धा। यदि लोग सिक्के डालने की बजाय भोजन, सेवा और दान के माध्यम से पुण्य कमाने का प्रयास करें, तो यह समाज और प्रकृति दोनों के लिए बेहतर होगा।














