उमाकांत त्रिपाठी।George Kurian Resignation की खबर ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। केंद्रीय राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन ने मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दे दिया है। राष्ट्रपति भवन की ओर से मंगलवार को जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सलाह पर उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। हालांकि, उनके इस्तीफे के पीछे की आधिकारिक वजह का खुलासा नहीं किया गया है।
65 वर्षीय जॉर्ज कुरियन मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय और मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में कार्यरत थे। वे अगस्त 2024 से मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद थे। उनका राज्यसभा कार्यकाल 21 जून 2026 को समाप्त हो गया था और भाजपा ने उन्हें दोबारा राज्यसभा भेजने का फैसला नहीं किया।
राज्यसभा कार्यकाल समाप्त होने के बाद आया इस्तीफा
जॉर्ज कुरियन का राज्यसभा कार्यकाल 21 जून को समाप्त हुआ था। संसदीय परंपराओं के अनुसार किसी मंत्री का संसद के किसी सदन का सदस्य होना आवश्यक होता है। भाजपा ने हालिया राज्यसभा चुनावों में उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया, जिसके बाद यह लगभग तय माना जा रहा था कि वे केंद्रीय मंत्रिमंडल से बाहर हो सकते हैं।
राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी प्रेस रिलीज में केवल इतना कहा गया कि प्रधानमंत्री की सलाह पर उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्यसभा सदस्यता समाप्त होने और पार्टी की नई राजनीतिक रणनीति के चलते यह फैसला लिया गया है।जॉर्ज कुरियन भाजपा के उन नेताओं में शामिल रहे हैं जिन्होंने दक्षिण भारत, विशेषकर केरल में पार्टी के विस्तार के लिए लंबे समय तक काम किया। उनकी संगठनात्मक भूमिका और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच पहुंच को देखते हुए उन्हें 2024 में केंद्र सरकार में शामिल किया गया था।
केरल में भाजपा की रणनीति का अहम चेहरा थे कुरियन
जॉर्ज कुरियन केरल के प्रमुख ईसाई संप्रदाय सीरो-मालाबार कैथोलिक चर्च से आते हैं। वे लंबे समय से भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पार्टी के प्रमुख ईसाई चेहरों में गिने जाते रहे हैं। टीवी डिबेट्स में भाजपा का पक्ष रखने के अलावा वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के केरल दौरों के दौरान उनके भाषणों का मलयालम भाषा में अनुवाद भी करते थे।
जब 2024 में मोदी 3.0 सरकार का गठन हुआ था, तब उनकी मंत्री पद पर नियुक्ति को भाजपा की एक बड़ी राजनीतिक रणनीति माना गया था। पार्टी केरल में ईसाई समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती थी और कुरियन को उसी रणनीति का प्रमुख हिस्सा समझा गया।
भाजपा नेतृत्व को उम्मीद थी कि ईसाई समुदाय में बढ़ती स्वीकार्यता का लाभ विधानसभा चुनावों में मिलेगा। लेकिन मई 2026 में हुए केरल विधानसभा चुनावों में पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। 140 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा केवल 3 सीटें जीत सकी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनावी नतीजों ने पार्टी की रणनीति की समीक्षा को मजबूर किया और इसका असर नेतृत्व स्तर पर भी दिखाई दिया।
राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने नहीं दोहराया भरोसा
हाल ही में 12 राज्यों की 26 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव हुए थे। इनमें मध्य प्रदेश, झारखंड, राजस्थान, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, गुजरात, मेघालय, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम शामिल थे।
18 जून को हुए इन चुनावों में 26 में से 23 उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हुए। भाजपा ने 4 जून को अपने उम्मीदवारों की सूची जारी की थी, लेकिन उसमें जॉर्ज कुरियन का नाम शामिल नहीं था। यह संकेत माना गया कि पार्टी अब राज्यसभा में नए चेहरों को अवसर देना चाहती है।राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, भाजपा संगठन आने वाले वर्षों में दक्षिण भारत की राजनीति को लेकर नई रणनीति पर काम कर रहा है। ऐसे में राज्यसभा उम्मीदवारों के चयन में भी उसी दृष्टिकोण को महत्व दिया गया।
आगे क्या होगी जॉर्ज कुरियन की भूमिका?
हालांकि जॉर्ज कुरियन अब केंद्रीय मंत्रिपरिषद का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन भाजपा संगठन में उनकी भूमिका पूरी तरह समाप्त होगी, ऐसा नहीं माना जा रहा है। पार्टी में उनकी लंबे समय से सक्रिय उपस्थिति रही है और दक्षिण भारत में संगठनात्मक अनुभव भी उनके पक्ष में जाता है।
भाजपा के भीतर उन्हें अभी भी केरल और अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिल सकती हैं। पार्टी नेतृत्व आगामी चुनावों और संगठन विस्तार के लिए उनके अनुभव का उपयोग कर सकता है।
फिलहाल, उनका इस्तीफा भाजपा और मोदी सरकार में चल रहे राजनीतिक पुनर्संतुलन के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि पार्टी उन्हें कोई नई जिम्मेदारी सौंपती है या नहीं।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो जॉर्ज कुरियन का मंत्रिपरिषद से बाहर होना केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि भाजपा की भविष्य की रणनीति और दक्षिण भारत की राजनीति को लेकर उसके नए दृष्टिकोण का संकेत भी माना जा रहा है।














