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‘छाती दबाना रेप की कोशिश नहीं’, पटना HC के आदेश पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, सुनाया ऐतिहासिक फैसला


Supreme Court Sexual Offence Handbook: खबर इंडिया की।Supreme Court Sexual Offence Handbook को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि यौन अपराध से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता पर तैयार राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी समिति की रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट और देश के सभी हाई कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइटों पर अपलोड किया जाए। इतना ही नहीं, अदालत ने राज्यों को भी निर्देश दिए हैं कि पुलिस एफआईआर दर्ज करने और चार्जशीट दाखिल करने के दौरान इस हैंडबुक में दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करे।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब हाल के महीनों में कुछ हाई कोर्ट के फैसलों को लेकर व्यापक बहस छिड़ी हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यौन अपराध जैसे संवेदनशील मामलों में न्यायिक अधिकारियों और जांच एजेंसियों को अधिक संवेदनशील, जिम्मेदार और कानूनी दृष्टि से प्रशिक्षित होना आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दिए ये निर्देश?

यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट के 17 मार्च 2025 के उस विवादित आदेश से जुड़ा है, जिसमें कहा गया था कि किसी लड़की के पजामे का नाड़ा खींचना और उसके स्तनों को पकड़ना अपने आप में रेप की कोशिश नहीं माना जाएगा। इस आदेश पर गंभीर सवाल उठने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था।

इसी मामले की सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी समिति ने न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने और सभी अदालतों में उपलब्ध कराने का आदेश दिया है ताकि भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई अधिक संवेदनशील और कानूनी दृष्टि से संतुलित तरीके से हो सके।

वरिष्ठ वकील ने पटना हाई कोर्ट के फैसले का भी किया उल्लेख

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इस तरह की टिप्पणियां समय-समय पर विभिन्न अदालतों से आती रही हैं। उन्होंने 9 जुलाई को पटना हाई कोर्ट के एक फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि किसी महिला की सलवार उतारना और उसकी छाती दबाना रेप की कोशिश साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता व्यक्त की और कहा कि न्यायिक अधिकारियों को पहले से दिए गए दिशा-निर्देशों और फैसलों का अध्ययन करना चाहिए। अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में कानूनी शोध और संवेदनशीलता दोनों आवश्यक हैं।

मुख्य न्यायाधीश ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि न्यायाधीशों की जिम्मेदारी केवल फैसला सुनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें पूर्व के महत्वपूर्ण निर्णयों और कानूनी सिद्धांतों का भी अध्ययन करना चाहिए।

उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा कि- न्यायिक अधिकारियों को रिसर्च करना चाहिए और संबंधित स्टाफ को भी अपने दायित्वों का सही ढंग से पालन करना चाहिए। जस्टिस वी. मोहना ने भी पूछा कि क्या पटना हाई कोर्ट के फैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों का उल्लेख किया गया था।

सभी अदालतों और पुलिस के लिए सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि देश की सभी अदालतें राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी द्वारा तैयार Supreme Court Sexual Offence Handbook में दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन करें।

इसके साथ ही राज्यों को निर्देश दिया गया कि सभी पुलिस थानों को आदेश जारी किए जाएं ताकि एफआईआर दर्ज करते समय और चार्जशीट दाखिल करते समय भी इस हैंडबुक का पालन सुनिश्चित हो। अदालत ने यह भी कहा कि इस संबंध में विस्तृत और तर्कपूर्ण फैसला भी सार्वजनिक किया जाएगा।

पटना हाई कोर्ट ने क्या कहा था?

हाल ही में पटना हाई कोर्ट ने एक मामले में कहा था कि किसी महिला की सलवार उतारना और उसकी छाती दबाना महिला की मर्यादा भंग करने का अपराध हो सकता है, लेकिन इसे स्वतः रेप की कोशिश नहीं माना जा सकता।

जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने अपने फैसले में कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत महिला की मर्यादा भंग करने का अपराध सिद्ध होता है, जबकि रेप की कोशिश के आरोप को पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला वर्ष 2008 का है। शिकायत के अनुसार, एक महिला अपने पिता के साथ अमरपुर स्थित एक फोटो स्टूडियो में गई थी। फोटो लेने के बाद स्टूडियो संचालक ने उसके पिता को बाहर इंतजार करने के लिए कहा और महिला को फोटो देखने के बहाने अंदर रोक लिया।

आरोप है कि उसने स्टूडियो का दरवाजा बंद कर महिला के साथ यौन उत्पीड़न की कोशिश की। महिला के शोर मचाने पर उसके पिता मौके पर पहुंचे और आरोपी वहां से फरार हो गया।

एफआईआर दर्ज होने के बाद ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को रेप की कोशिश और गलत तरीके से बंधक बनाने के आरोप में दोषी ठहराया था। हालांकि, हाई कोर्ट ने साक्ष्यों की समीक्षा के बाद कहा कि मेडिकल सबूत और अन्य आवश्यक प्रमाण पर्याप्त नहीं थे। इसलिए रेप की कोशिश की सजा रद्द कर दी गई, जबकि महिला की मर्यादा भंग करने का अपराध माना गया।

फैसले का व्यापक प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि Supreme Court Sexual Offence Handbook को सार्वजनिक करने और सभी अदालतों व पुलिस तंत्र के लिए अनिवार्य संदर्भ दस्तावेज बनाने का निर्णय भविष्य में यौन अपराध मामलों की जांच और सुनवाई को अधिक संवेदनशील और एकरूप बनाने में मदद करेगा।

यह फैसला न्यायपालिका, पुलिस और अभियोजन एजेंसियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश भी है कि यौन अपराध जैसे गंभीर मामलों में केवल तकनीकी पहलुओं पर नहीं, बल्कि पीड़ित के अधिकारों, गरिमा और न्यायिक संवेदनशीलता पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम देशभर में न्यायिक प्रक्रिया को अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी और पीड़ित-केंद्रित बनाने की दिशा में एक अहम पहल माना जा रहा है।

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