Comprehensive Sex Education in Schools: खबर इंडिया की।Comprehensive Sex Education in Schools को लेकर देश में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने जानकारी दी कि स्कूलों में व्यापक यौन शिक्षा (Comprehensive Sex Education) को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने के लिए गठित 26 सदस्यीय राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप चुकी है। अब सुप्रीम कोर्ट की अंतिम मंजूरी मिलने के बाद इस दिशा में औपचारिक प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है।
इस पहल का उद्देश्य केवल यौन शिक्षा देना नहीं है, बल्कि किशोरों को उनके अधिकारों, सुरक्षित व्यवहार, रिश्तों की समझ, डिजिटल सुरक्षा और पॉक्सो (POCSO) कानून के बारे में सही एवं वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराना है। विशेषज्ञों का मानना है कि- इससे किशोरों में जागरूकता बढ़ेगी और कई कानूनी व सामाजिक समस्याओं को कम करने में मदद मिल सकती है।
Supreme Court ने सरकार से मांगी थी जानकारी
Comprehensive Sex Education in Schools का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में किशोरों के निजता के अधिकार से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया। इस मामले की सुनवाई जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ कर रही है।
अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा था कि स्कूलों में वैज्ञानिक और व्यापक यौन शिक्षा को लेकर क्या तैयारी की गई है। इसके जवाब में सरकार ने बताया कि इस विषय पर गठित विशेषज्ञ समिति अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर चुकी है और उसे सरकार को सौंप दिया गया है। अदालत की मंजूरी के बाद इसे लागू करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
15 से 18 वर्ष के किशोरों से जुड़े मामलों पर कोर्ट की चिंता
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से 15 से 18 वर्ष की आयु के किशोरों के बीच आपसी सहमति से बनने वाले संबंधों को लेकर चिंता व्यक्त की।
अदालत का कहना था कि हर ऐसे मामले को गंभीर आपराधिक अपराध मानना हमेशा उचित नहीं हो सकता। इसलिए किशोरों को कानून, व्यक्तिगत अधिकारों और जिम्मेदारियों के बारे में सही जानकारी देना बेहद आवश्यक है।
इसी सोच के तहत Comprehensive Sex Education in Schools को एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिससे किशोर बेहतर निर्णय लेने में सक्षम बन सकें और कानून की सही समझ विकसित कर सकें।
26 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति ने तैयार किया रोडमैप
सुप्रीम Court के निर्देश के बाद केंद्र सरकार ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव की अध्यक्षता में 26 सदस्यीय राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया था।
इस समिति में कई प्रतिष्ठित संस्थानों और विभागों के विशेषज्ञ शामिल किए गए, जिनमें—
- टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के विशेषज्ञ
- क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट
- महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अधिकारी
- शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञ
- विभिन्न मंत्रालयों के प्रतिनिधि
समिति को ऐसा व्यावहारिक रोडमैप तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी जिससे Comprehensive Sex Education in Schools को प्रभावी और संतुलित तरीके से लागू किया जा सके।
रिपोर्ट में किशोरों को सुरक्षित व्यवहार, लैंगिक समानता, व्यक्तिगत सीमाओं, ऑनलाइन सुरक्षा, सहमति (Consent) और POCSO कानून के बारे में जानकारी देने पर विशेष जोर दिया गया है।
स्कूलों में यौन शिक्षा क्यों मानी जा रही है जरूरी?
विशेषज्ञों का कहना है कि आज का दौर इंटरनेट और सोशल मीडिया का है। बच्चे पहले की तुलना में कम उम्र में ही विभिन्न प्रकार की जानकारियों तक पहुंच जाते हैं।
लेकिन सही मार्गदर्शन नहीं मिलने पर कई बार वे अधूरी या गलत जानकारी के आधार पर निर्णय लेने लगते हैं। यही कारण है कि Comprehensive Sex Education in Schools को समय की जरूरत बताया जा रहा है।
वैज्ञानिक और उम्र के अनुसार तैयार किया गया पाठ्यक्रम बच्चों को न केवल शारीरिक बदलावों की जानकारी देगा बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, रिश्तों की समझ और व्यक्तिगत सुरक्षा के बारे में भी जागरूक करेगा।
पैरेंट्स एसोसिएशन ने किया समर्थन
पैरेंट्स एसोसिएशन के डायरेक्टर अशोक अग्रवाल ने इस पहल का स्वागत किया है।उन्होंने कहा कि- भारत में लंबे समय से व्यापक सेक्स एजुकेशन की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। आज के बच्चे पहले की तुलना में अधिक जिज्ञासु हैं लेकिन सही जानकारी के अभाव में भ्रमित हो जाते हैं।
उनके अनुसार यदि Comprehensive Sex Education in Schools को वैज्ञानिक और संतुलित तरीके से पढ़ाया जाएगा तो बच्चे अधिक जिम्मेदार और जागरूक नागरिक बनेंगे।
परिवारों में संवाद की कमी भी बड़ी वजह
अशोक अग्रवाल का कहना है कि अधिकांश परिवारों में आज भी यौन शिक्षा जैसे विषयों पर खुलकर बातचीत नहीं होती।
ऐसे में बच्चों को सही जानकारी नहीं मिलती और वे इंटरनेट या दोस्तों से मिली अधूरी सूचनाओं पर भरोसा करने लगते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि- यदि स्कूलों में व्यवस्थित तरीके से इस विषय की शिक्षा दी जाएगी तो किशोर रिश्तों, सीमाओं, सहमति और जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे।
सोशल वर्कर ने भी बताया सकारात्मक कदम
सोशल वर्कर योगिता भयाना ने भी इस पहल का समर्थन किया है।उनका कहना है कि- Comprehensive Sex Education in Schools केवल यौन शिक्षा तक सीमित नहीं है बल्कि यह बच्चों को सुरक्षित व्यवहार, आत्मसम्मान, व्यक्तिगत अधिकार और जिम्मेदार फैसले लेने की समझ भी देता है।
उन्होंने कहा कि इससे पॉक्सो कानून के संभावित दुरुपयोग को कम करने के साथ-साथ बच्चों की सुरक्षा और जागरूकता दोनों बढ़ेंगी।
अदालत की मंजूरी के बाद आगे बढ़ेगी प्रक्रिया
फिलहाल 26 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप चुकी है। अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय पर है।
यदि अदालत मंजूरी देती है तो Comprehensive Sex Education in Schools को चरणबद्ध तरीके से देश के स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल करने की दिशा में औपचारिक प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि- इस पहल से बच्चों को केवल शैक्षणिक ज्ञान ही नहीं बल्कि जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों की भी वैज्ञानिक और जिम्मेदार समझ विकसित होगी। इससे किशोरों के अधिकारों की सुरक्षा मजबूत होगी, कानूनी जागरूकता बढ़ेगी और वे भविष्य में अधिक सुरक्षित एवं जिम्मेदार निर्णय लेने में सक्षम बन सकेंगे।














