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Balloon Sellers in Fairs: ‘सिर्फ मेले में आता हूं, महीने के 80 हजार कमा लेता हूं.. गुब्बारे बेचने वाले ने बताया कमाई का सिस्टम

खबर इंडिया की।नवरात्रि, दशहरा और रामलीला के दौरान देशभर में जगह-जगह मेले लगते हैं। कहीं बड़े-बड़े झूले लोगों को आकर्षित करते हैं, तो कहीं खिलौनों, झुमकों, चाट-पकौड़े और छोले-भटूरे की दुकानों पर भीड़ उमड़ती है। इन सबके बीच रंग-बिरंगे गुब्बारे बेचते लोग भी दिखाई देते हैं। कई बार ये गुब्बारे वाले बच्चों के साथ मेले में आए लोगों से एक गुब्बारा खरीदने की गुजारिश करते हैं, लेकिन हम अक्सर उन्हें नजरअंदाज करके आगे बढ़ जाते हैं।

हमें लगता है कि मेले में भीड़ देखकर ये लोग कुछ गुब्बारे लेकर बेचने आ गए होंगे। लेकिन Balloon Sellers in Fairs की जिंदगी और उनकी कमाई का गणित इतना आसान नहीं है। मेले में गुब्बारे बेचने के लिए सिर्फ गुब्बारे खरीदना और उन्हें लेकर खड़े हो जाना काफी नहीं होता। इसके लिए जगह का इंतजाम करना पड़ता है और कई बार भारी-भरकम रकम भी चुकानी पड़ती है।

नोएडा स्टेडियम में इन दिनों चल रहे रामलीला मेले के बाहर गुब्बारे बेचने वाले ब्रजमोहन की कहानी इस मेहनत और संघर्ष को समझाती है। संभल से नोएडा आए ब्रजमोहन ने बताया कि मेले में गुब्बारे बेचकर कमाई करने के लिए उन्हें किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

मेले में गुब्बारे बेचना क्यों नहीं है आसान?

जब हम किसी मेले में जाते हैं, तो वहां गुब्बारे बेचने वाले कई लोग दिखाई देते हैं। रंग-बिरंगे गुब्बारों से सजी उनकी दुकानें बच्चों को अपनी ओर खींचती हैं। लेकिन इन दुकानों के पीछे की मेहनत और खर्च के बारे में बहुत कम लोग सोचते हैं।

गुब्बारे बेचने वालों के लिए सबसे बड़ी चुनौती सही जगह पर दुकान लगाने की होती है। मेले के अंदर दुकान लगाने के लिए उन्हें आयोजकों या ठेकेदारों को कमीशन देना पड़ सकता है। वहीं, मेले के बाहर भी सड़क किनारे दुकान लगाने के लिए जगह का इंतजाम करना पड़ता है।

ब्रजमोहन के मुताबिक, नोएडा स्टेडियम के रामलीला मेले के अंदर गुब्बारे बेचने के लिए एक दिन का कमीशन करीब 1500 रुपये है। ऐसे में छोटे स्तर पर कारोबार करने वाले व्यक्ति के लिए इतनी रकम पहले ही खर्च कर देना जोखिम भरा हो सकता है।

यही वजह है कि कई गुब्बारे वाले मेले के अंदर दुकान लगाने के बजाय बाहर ही अपना सामान बेचते हैं। उन्हें उम्मीद रहती है कि मेले में आने-जाने वाले लोगों के बीच उनकी बिक्री हो जाएगी और खर्च निकालने के बाद कुछ कमाई भी बच जाएगी।

संभल से नोएडा तक गुब्बारे बेचने आते हैं ब्रजमोहन

नोएडा स्टेडियम के बाहर दोपहर करीब एक बजे का समय था। मेले की रौनक बढ़ने में अभी कई घंटे बाकी थे। आमतौर पर शाम करीब पांच बजे के बाद मेले में लोगों की आवाजाही बढ़ने लगती है। इसी दौरान एक शख्स छोटे से तंबू में बैठकर गुब्बारों में हवा भर रहा था।

जब उससे पूछा गया कि क्या वह शाम को मेले के अंदर गुब्बारे बेचता है, तो उसने मना कर दिया। बातचीत आगे बढ़ी तो उसने अपना नाम ब्रजमोहन बताया। वह संभल का रहने वाला है और गुब्बारे बेचने के लिए नोएडा आया है।

ब्रजमोहन ने बताया कि वह केवल एक ही शहर में गुब्बारे नहीं बेचता। मेरठ, बुलंदशहर, संभल, अलीगढ़, दिल्ली और नोएडा जैसे शहरों में जहां भी मेले लगते हैं, वह वहां पहुंचने की कोशिश करता है।

उसके लिए मेला सिर्फ घूमने-फिरने की जगह नहीं, बल्कि रोजी-रोटी कमाने का जरिया है। अलग-अलग जगहों पर लगने वाले मेलों के सहारे ही वह अपने कारोबार को आगे बढ़ाता है।

मेले के अंदर दुकान लगाने के लिए देना पड़ता है 1500 रुपये कमीशन

ब्रजमोहन ने बताया कि मेले के अंदर गुब्बारे बेचने का मौका हमेशा नहीं मिल पाता। इसकी एक बड़ी वजह दुकान लगाने के लिए मांगी जाने वाली रकम है।

उसके मुताबिक, नोएडा स्टेडियम के अंदर गुब्बारे बेचने के लिए एक दिन का करीब 1500 रुपये कमीशन देना पड़ता है। छोटे कारोबार के लिए यह रकम काफी मायने रखती है। अगर बिक्री कम हुई, तो दिनभर की मेहनत के बावजूद नुकसान उठाना पड़ सकता है।

इसके मुकाबले मेले के बाहर कुछ लोग करीब 300 रुपये लेकर दुकान लगाने की जगह दे देते हैं। इसलिए ब्रजमोहन जैसे कई विक्रेता बाहर सड़क किनारे खड़े होकर गुब्बारे बेचने का विकल्प चुनते हैं।

हालांकि, यह व्यवस्था और रकम हर मेले में एक जैसी हो, ऐसा जरूरी नहीं है। अलग-अलग जगहों पर स्थानीय नियमों और आयोजकों की व्यवस्था के मुताबिक खर्च बदल सकता है।

दिनभर गुब्बारों में भरता है हवा, शाम को शुरू होती है कमाई

ब्रजमोहन का काम केवल ग्राहकों को गुब्बारे बेचने तक सीमित नहीं है। बिक्री शुरू होने से पहले उसे काफी तैयारी करनी पड़ती है। वह दिन में ही गुब्बारों में हवा भरता है और उन्हें सजाकर तैयार करता है।

इस काम में कई घंटे निकल जाते हैं। इसके बाद शाम होते ही वह मेले के बाहर सड़क किनारे अपनी जगह पर खड़ा हो जाता है। देर रात तक, यानी करीब 10 से 11 बजे तक, वह आने-जाने वाले लोगों को गुब्बारे बेचता रहता है।

उसके पास अलग-अलग तरह के गुब्बारे और छोटे खिलौने भी होते हैं। ब्रजमोहन एक जोड़ी वाला गुब्बारा करीब 50 रुपये में बेचता है। इसके अलावा वह 20 रुपये से लेकर 100 रुपये तक के छोटे खिलौने भी रखता है, ताकि ग्राहक गुब्बारों के साथ दूसरे सामान भी खरीद सकें।

इस तरह वह एक ही जगह पर अलग-अलग चीजें बेचकर अपनी कमाई बढ़ाने की कोशिश करता है। हालांकि, बिक्री पूरी तरह इस बात पर निर्भर करती है कि उस दिन मेले में कितने लोग आते हैं और कितने ग्राहक उससे सामान खरीदते हैं।

एक दिन में कितनी कमाई कर लेते हैं गुब्बारे वाले?

ब्रजमोहन के मुताबिक, मेले में एक दिन के दौरान वह करीब 1000 से 1500 रुपये के गुब्बारे बेच लेता है। कुछ दिन बिक्री अच्छी रहती है, तो यह आंकड़ा 2000 से 2500 रुपये तक पहुंच जाता है।

लेकिन हर दिन ऐसा नहीं होता। कभी बिक्री इतनी कम रहती है कि 500 रुपये का आंकड़ा भी पार नहीं हो पाता। ऐसे दिनों में जगह का किराया, सामान की लागत और आने-जाने का खर्च निकालना मुश्किल हो सकता है।

यहां एक बात समझना जरूरी है कि बिक्री से मिलने वाली पूरी रकम कमाई या मुनाफा नहीं होती। इसमें से गुब्बारे खरीदने, उन्हें तैयार करने, जगह के लिए भुगतान करने और दूसरे खर्चों को निकालना पड़ता है। इसके बाद ही पता चलता है कि दिनभर की मेहनत से वास्तव में कितने पैसे बचे।

इसी वजह से ब्रजमोहन मेले के अंदर दुकान लगाने के बजाय बाहर रहकर कारोबार करना बेहतर समझता है। उसके लिए कम खर्च में सामान बेच पाना ज्यादा जरूरी है, क्योंकि बिक्री का कोई निश्चित भरोसा नहीं होता।

अगली बार मेले में गुब्बारे वाला दिखे, तो उसकी मेहनत भी समझिए

अक्सर मेले में छोटे बच्चों के साथ घूमने आए परिवारों को गुब्बारे बेचने वाले आवाज देते हैं। कई बार वे ग्राहकों के पीछे चलते हुए एक गुब्बारा खरीदने की गुजारिश भी करते हैं। ऐसे में कुछ लोग उन्हें परेशान करने वाला समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।

लेकिन ब्रजमोहन की कहानी बताती है कि इन छोटे कारोबारियों के लिए हर ग्राहक कितना मायने रखता है। उन्हें सामान तैयार करने से लेकर दुकान लगाने की जगह ढूंढने तक कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसके बाद भी यह तय नहीं होता कि दिनभर में कितनी बिक्री होगी।

इसलिए अगली बार जब आप किसी मेले के गेट पर गुब्बारे बेचने वाले को देखें, तो यह भी सोचिए कि वह कितनी मेहनत करके वहां तक पहुंचा होगा। अगर आपको गुब्बारा खरीदने की जरूरत नहीं है, तो मना करना आपका अधिकार है। लेकिन उनकी मेहनत और सम्मान को नजरअंदाज करना जरूरी नहीं है।

ब्रजमोहन जैसे लोगों के लिए मेला मनोरंजन से ज्यादा कमाई का एक मौका है। रंग-बिरंगे गुब्बारों के पीछे छिपी उनकी मेहनत हमें याद दिलाती है कि किसी भी छोटे कारोबार की असली कहानी सिर्फ उसकी बिक्री से नहीं, बल्कि उसे चलाने के लिए किए जाने वाले संघर्ष से भी बनती है।

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