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इंग्लैंड में राहुल गांधी के बिगड़े बोल, राष्ट्र को लेकर की थी ये टिप्पणी

राहुल गांधी अपनी बातों की वजह से हमेशा विवादों में रहते है। आपको बता दें कि हाल ही में राहुल गांधी इंग्लैंड मे आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लिया था, जहां उन्होंने कहा कि राष्ट्र का मतलब किंगडम यानी साम्राज्य होता है। ये बयान देने के बाद राहुल गांधी की छवि पर बहुत बुरा असर पड़ा है। लोगो का कहना है कि क्या यह हैरानी की बात नहीं है, कि जो व्यक्ति भारत का प्रधानमंत्री बनना चाहता है, वह कह रहा है कि राष्ट्र का मतलब किंगडम यानी साम्राज्य होता है।

राहुल गांधी की छवि गढऩे वालों के धैर्य की प्रशंसा करनी पड़ेगी। लोंगो का कहना है कि एक प्रोडक्ट बार-बार फेल हो जाए तो निर्माता उसे बंद करके नया उत्पाद बाजार में लेकर आता है। कांग्रेस की समस्या यहीं से शुरू होती है। कंपनी यानी कांग्रेस या सोनिया गांधी की जिद है कि प्रोडक्ट तो यही रहेगा, उसकी पैकेजिंग बदलते रहो। दूसरी समस्या यह है कि पैकेजिंग खोलते ही पता चल जाता है कि यह तो पहले से भी अधिक खराब हो गया है। इसके बाद भी गजब का विश्वास है सोनिया गांधी का कि उन्हें कोई खराबी दिखती ही नहीं। कहावत है कि 12 साल में घूरे के दिन भी फिरते हैं। यहां तो 18 साल हो गए और आगे कोई उम्मीद दिखती नहीं। बेटे के प्रति मां का मोह जगजाहिर है, पर कांग्र्रेसियों को क्या कहें? सब जानते हुए भी गूंगे-बहरे बने हुए हैं। आस-पास जो घट रहा है, उसे भी वे निरपेक्ष भाव से देखते हैं।

पिछले कुछ समय में ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, सुनील जाखड़, हार्दिक पटेल और कपिल सिब्बल पार्टी छोड़ गए। कांग्रेस से निकलकर ये सब सुखी हैं और उन्हें अपना भविष्य उज्ज्वल भी दिख रहा है। इनमें से दो मंत्री बन गए। एक राज्यसभा में जा रहा है। इसमें कोई शंका नहीं है कि बाकी दो जल्दी ही किसी न किसी महत्वपूर्ण पद पर होंगे। नेहरू-गांधी परिवार की समस्या यह है कि उन्हें भारतीय संस्कृति की न तो समझ है और न ही उसमें कोई रुचि। जिस पौधे की जड़ जमीन के अंदर न हो, सूख जाना ही उसका प्रारब्ध है।

इस बात की पुष्टि करने के लिए किसी परीक्षण की जरूरत नहीं है। राहुल गांधी के बयानों से भारतीय संस्कृति से जुड़े मुद्दों पर उनके उथले चिंतन का ही पता चलता है। राहुल गांधी ने कभी चाणक्य को पढ़ा होता या किसी से सुना भी होता, तो उनके मुंह से यह निकलता ही नहीं कि भारत एक राष्ट्र नहीं है। चाणक्य को छोडि़ए उन्होंने अपने पिता राजीव गांधी के नाना जवाहरलाल नेहरू को ही पढ़ा होता तो उन्हें भारत के जनपदों का इतिहास पता होता।

कांग्रेस के लोग महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहते नहीं थकते। कोई राहुल गांधी से पूछे कि जब भारत राष्ट्र ही नहीं तो गांधी राष्ट्रपिता कैसे? भारत ही नहीं पूरी दुनिया के लिए एक बात कही जा सकती है कि राजनीति में जो भी है, यदि वह धर्म और राजनीति के अन्योन्याश्रित संबंध को नहीं समझता तो उसका राजनीति में सफल होना लगभग असंभव होता है। बशर्ते कि कपट उसका मूल स्वभाव हो।

सोनिया गांधी और कांग्रेस के लोगों को यह समझना होगा कि राहुल गांधी राजनीति के लिए नहीं बने हैं। राजनीति उनके लिए वैसे ही है, जैसे इस देश के तमाम बच्चों के लिए गणित का विषय। दो मामलों में सोनिया गांधी भारतीय हैं। पहला है, पुत्र मोह। दूसरा है, भारतीय अभिभावकों की तरह यह जिद कि उनकी संतान वही पढ़े या करे, जो वे चाहते हैं। जाहिर है कि इस चक्कर में बच्चे की नैसर्गिक प्रतिभा कुंद हो जाती है। वह जो बनना चाहता है, बन नहीं पाता और जो मां-बाप चाहते हैं, वह बनने की उसमें क्षमता नहीं है।

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