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5G Internet : 5G स्पैक्ट्रम सरकार ने सस्ते में बेचा क्या?

टाइम्स ऑफ इंडिया के अख़बार का स्क्रीन शॉट पिछले दिनों वायरल हुआ कि 5G स्पैक्ट्रम की नीलामी में 2.80 लाख करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ. पूर्व टेलीकॉम मंत्री डी राजा ने आरोप लगाया कि जब सरकार का ख़ुद अनुमान था कि पाँच लाख करोड़ रुपये का स्पैक्ट्रम बिकेगा तो सिर्फ़ डेढ़ लाख करोड़ रुपये क्यों मिले? ये वही राजा हैं जिनको 2G घोटाले में जेल जाना पड़ा. CAG यानी सरकार के सबसे बड़े अकाउंटेंट ने 2010 में कहा था कि 2G लाइसेंस के आवंटन से सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ. ये घोटाला कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार पर ऐसा चिपका कि आख़िर में 2014 के करारी हार मिली. आगे चलकर कोर्ट ने राजा को सबूत के अभाव में बरी कर दिया. अब 5G के स्पेक्ट्रम की नीलामी हुई तो कई लोगों के मन में सवाल उठा कि क्या 2G से भी सस्ता बिक गया 5G?

आज 5G का हिसाब किताब. सबसे पहले तो ये जान लीजिए कि टाइम्स ऑफ इंडिया की वो कटिंग फ़ोटो शॉप से बनाईं गईं. ऐसी कोई ख़बर नहीं छपी थी. रही बात राजा के आरोप की तो इसका जवाब ख़ुद टेलीकॉम मंत्री अश्विनी वैष्णव ने दिया है. उन्होंने हिंदू अख़बार को बताया कि क़रीब डेढ़ लाख करोड़ रुपये का स्पैक्ट्रम बिक गया जबकि क़रीब दो लाख 81 हज़ार करोड़ रुपये के स्पैक्ट्रम का कोई ख़रीदार नहीं मिला. 600 MHz और 2300 MHz के स्पैक्ट्रम नहीं बिके. उन्होंने ऐसे समझाया कि अगर कोई 100 मकान बेचने निकला है और 70 मकान ही बिके हैं तो इसका मतलब ये नहीं है कि घाटा हो गया. 30 मकान अब भी मालिक के पास है यानी जो स्पैक्ट्रम नहीं बिका वो सरकार के पास है. मोबाइल टेलीफोन मार्केट की हालत ठीक नहीं होने के कारण ऐसा हुआ है.

स्पैक्ट्रम क्या है?

आप इस वक़्त ये लेख पढ़ पा रहे हैं तो इसके लिए स्पैक्ट्रम को शुक्रिया कहिए. स्पैक्ट्रम अदृश्य रेडियो तरंगें है जो संदेश एक जगह से दूसरी जगह तक पहुँचाती है. चाहे आप फ़ोन पर बात कर रहे हो या मेसेज भेज रहे हो या कोई वीडियो देख रहे हैं. ये सारी बातें रेडियो स्पैक्ट्रम के ज़रिए संभव है. ये इलेक्टरो मैगनेटिक स्पैक्ट्रम का हिस्सा है जो प्राकृतिक संपदा है. हर देश की सरकार इसे अपने हिसाब से रेग्यूलेट करती है. आपने कभी रेडियो चलाया हो तो आपको स्टेशन पकड़ने के लिए बटन को ऊपर या नीचे घूमाना पड़ता है तब गाना सुनाई देता है. उसी तरह आप बटन को ऊपर या नीचे घूमाते रहे तो अलग अलग फ़्रीक्वेंसी पर अलग-अलग काम होते है. कुछ बैंड मोबाइल सेवा के लिए होते है, कुछ सेटेलाइट के लिए तो कुछ पर सेना अपना कम्यूनिकेशन करती है. एयर ट्रैफ़िक कंट्रोल ATC भी इसी के ज़रिए हवाई यातायात को नियंत्रित करती है. ये सारा स्पैक्ट्रम सरकार ट्रैफ़िक पुलिस की तरह नियंत्रित करती है. एक सेवा दूसरे के बैंड में चली जाती है तो कम्यूनिकेशन ठप हो सकता है. वैसे ब्लू टूथ भी स्पैक्ट्रम की वजह से ही चलता है. बस , सरकार उसे कंट्रोल नहीं करती है. मोबाइल सेवा के लिए सरकार स्पैक्ट्रम की नीलामी करती है, जिसे जियो, एयरटेल जैसी कंपनियाँ ख़रीदती है और फिर मोबाइल फ़ोन सेवा देती है. जो 1G से 5G तक पहुँच गई है. 25 साल पहले तक मोबाइल से कहीं से भी आप सिर्फ़ बात कर पाते थे, फिर SMS आएँ और धीरे-धीरे इसने कम्प्यूटर की जगह ले ली. मोबाइल से दुनिया मुट्ठी में आ गईं.

5G क्या है?

5G का मतलब तो आप जानते हैं कि पाँचवीं जनरेशन या पीढ़ी है. ये जनरेशन अपने से पहले वाली पीढ़ी 4G से 100 गुना ज़्यादा तेज होगी. अभी आपका फ़ोन दो लेन के हाइवे पर चल रहा हैं. रास्ते पर ट्रैफ़िक ज़्यादा होने के के कारण जाम लग जाता है जो आपको 4G फ़ोन पर भी महसूस होता होगा. वीडियो धीमे लोड हो रहा है, कॉल ड्रॉप हो जा रहा है. अब दो लेन की जगह 200 लेन का हाइ वे होगा तो ट्रैफ़िक तेज चलेगा. आपको वीडियो देखने में आसानी होगी. आगे चलकर सेल्फ़ ड्राइविंग कार एक दूसरे से बात कर सकेंगीं. रिमोट से सर्जरी हो सकेगी. ये सब अभी कुछ साल दूर है. तुरंत जो होगा कि इंटरनेट की स्पीड 100 गुना बढ़ जाएगी.

स्पैक्ट्रम प्राकृतिक संपदा होने के कारण सीमित है, दुनिया ने टेक्नोलॉजी की मदद से स्पीड बढ़ा ली है. 5G के लिए टॉवर्स से काम नहीं चलेगा. छोटे-छोटे सेल कम दूरी पर लगाने होंगे. लोअर बैंड के स्पैक्ट्रम से आप दूर तक सिग्नल तो भेज सकते है लेकिन वो धीमे चलेंगे वहीं तेज़ी से चलने वाले हाई स्पैक्ट्रम बैंड के सिग्नल को आगे बढ़ाने के लिए जगह जगह ये सेल लगेंगे.

5G कब से आएगा?

एयरटेल, जियो और Vi ने स्पैक्ट्रम ख़रीद लिया है. तीनों कंपनियों का दावा है कि अगस्त के महीने में ही सेवा लॉंच हो जाएगी. कंपनियों के पास स्पैक्ट्रम आ गया है. नेटवर्क का विस्तार करने में समय लगेगा. जानकारों का मानना है कि अगले कुछ महीनों में दिल्ली मुंबई में 5G आ जाएगा लेकिन पूरे देश में पहुँचने में चार पाँच साल लग जाएँगे, ज़्यादा भी लग सकता है. ये मत सोचिए कि आपको मुफ़्त में मिल जाएगा. स्पीड बढ़ेगी तो बिल भी बढ़ेगा. ये तो शुक्र मनाइए कि डेढ़ लाख करोड़ रुपए का स्पैक्ट्रम ही कंपनियों ने ख़रीदा है ज़्यादा ख़रीदते तो हमें और बिल चुकाना पड़ता. केंद्रीय मंत्री वैष्णव ने सही कहा कि मोबाइल कंपनियों की हालत ठीक नहीं है. देखा जाए तो दो प्राइवेट कंपनियाँ ही बची है एयरटेल और रिलायंस जियो . एयरटेल भी 2016 में जियो के आने के बाद से घाटे में चली गई थी, अब जाकर मुनाफ़े में है. वोडाफ़ोन और आइडिया मिलकर Vi बना , अब तक घाटे में है. इसे बचाने के लिए सरकार को हिस्सेदारी ख़रीदना पड़ी. BSNL को फिर से सरकार ने पैकेज दिया है. इन कंपनियों की माली हालत ख़राब होने के चलते 2.81 लाख करोड़ रुपये का स्पैक्ट्रम बिक नहीं पाया.सरकार का ज़ोर भी पहले की तरह स्पैक्ट्रम बिक्री से ज़्यादा कमाई करने का नहीं है. पिछले दस सालों में सरकार की कमाई तो होती रहीं लेकिन टेलीकॉम कंपनियाँ बर्बाद हो गई.अब सरकार का ज़ोर कमाई के बजाय सेक्टर को टिकाऊ बनाने पर है. इसमें कोई घोटाला नहीं है.

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