उमाकांत त्रिपाठी।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में 80 साल से चली या रही वैश्विक व्यवस्था पर आक्रामक हैं. उनका मानना है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका द्वारा निर्मित वैश्विक व्यवस्था के ढांचे में ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ के उद्देश्य को पूरा नहीं किया जा सकता है. इसलिए अमेरिकी विदेश नीति में एक आक्रामकता और छटपटाहट दोनों एक साथ देखा जा सकता है. जो अमेरिका मुक्त व्यापार और नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था का प्रबल समर्थक था. आज वही हर रोज किसी ना किसी देश पर टैरिफ बढ़ाने कि घोषणा कर रहा है. यहां तक कि वह अब किसी देश की संप्रभुता का उल्लंघन करने से भी परहेज नहीं कर रहा है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक बदलाव के दौर से गुजर रही है. अमेरिका और यूरोप अपने ऐतिहासिक साझेदारी को नजरंदाज कर संबंधों को फिर से परिभाषित कर रहे हैं.
वहीं रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन एक ऐसी त्रिपक्षीय दुनिया चाहते हैं, जिसे मॉस्को, वॉशिंगटन और बीजिंग के साथ मिलकर आकार दे सकें. शी जिनपिंग पूर्वी एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को पलटना चाहते हैं. वो चीनी विशेषताओं वाली विश्व व्यवस्था चाहते हैं. जबकि, भारत और ब्राजील जैसे देश एक बहुध्रुवीय दुनिया में ध्रुव बनना चाहते हैं, जो नियम आधारित व्यवस्था हो, जिसमें विकासशील देश स्वायत्तता कि गारंटी के साथ-साथ विकसित और विकासशील देश एक-दूसरे के विकास में पूर्णतः साझेदार हों. वहीं ट्रंप पुरानी व्यवस्था को एक हवाई किले कि कल्पना मानते हैं. उनका कहना है कि अमेरिका को अपनी आर्थिक और सैन्य शक्ति के इस्तेमाल में रोका नहीं जाना चाहिए और यह दिखाना है कि उसे रोका नहीं जाएगा.
ऐसे में सवाल यह उठता है कि- इस बदलती हुई वैश्विक व्यवस्था में भारत अपने राष्ट्रीय हितों को कैसे साधता है. संयोग से भारत को नरेंद्र मोदी के रूप में एक कुशल और दूरदर्शी नेतृत्व मिल हुआ है. जिन्होंने अमेरिका के आक्रामक नीति को संतुलित करते हुए आखिरकार ट्रंप को भारत कि ओर झुकने पर मजबूर किया है. महाशक्तियों के साथ कोई टकराव किए बिना भारत को 2047 तक विकसित देश बनाना इस सरकार की विदेश और अर्थ नीति का मुख्य उद्देश्य है. अब सवाल यह उठता है कि नरेंद्र मोदी कैसे डोनाल्ड ट्रंप के साथ ट्रेड डील करने में सफल हुए. वह भी ऐसे समय जब ट्रंप बार-बार अंतरराष्ट्रीय मंचों से भारत को नीच दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे.














