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कैसे हो रही अयोध्या में रामलला की सेवा, जानें प्रभु श्रीराम के पूजा विधान का पूरा शेड्यूल

उमाकांत त्रिपाठी। रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद उनकी पूजा का विधान ऐसे तय किया गया है, जैसे राजा दशरथ के महल में अयोध्या के राजकुमार की 5 वर्ष की अवस्था में सेवक सेवा कर रहे हों। एक राजकुमार बालक की तरह उन्हें जगाया जाता है। उनकी रुचि का भोजन कराया जाता है। आराम कराया जाता है। वे राजकुमार की ही तरह जनता को दर्शन देते हैं। दान करते हैं। संगीत सुनते हैं और रोज चारों वेदों का पाठ भी सुनते हैं।

पहले होता है जागरण
सुबह 4 बजे से रात 10 बजे तक की दिनचर्या तय है। रामलला को अर्चक सुबह 4 बजे उसी तरह जगाते हैं, जैसे माता कौशल्या जगाती थीं। रामलला और गुरुओं की आज्ञा लेकर ही अर्चक गर्भगृह में प्रवेश करते हैं। इसके बाद जय-जयकार करते हैं। बालक-राम का बिस्तर ठीक किया जाता है। उन्हें मंजन कराया जाता है। रामलला को मुकुट या पगड़ी पहनाई जाती है, क्योंकि वे राजकुमार हैं, खुले सिर किसी के सामने नहीं जाते। इसके बाद अखंड फल का भोग लगता है। इसमें राजकुमार की रुचि के अनुसार फल, रबड़ी, मालपुआ, मक्खन, मिश्री, मलाई आदि होती है। भगवान को मालपुआ बहुत पसंद है।

फिर होता है पूजन
मंगला आरती होती है। इसमें ऐसे व्यक्तियों को ही प्रवेश देते हैं, जिनके बारे में मान्यता है कि उनके दर्शन से श्री और सौभाग्य में वृद्धि होती है। रामलला को सफेद गाय और बछड़े का दर्शन कराया जाता है। फिर गज दर्शन कराया जाता है। ट्रस्ट ने इसके लिए स्वर्ण गज की व्यवस्था की है। राजकुमार अपने स्वभाव के अनुरूप रोज दान करते हैं। फिर पट बंद हो जाते हैं। भगवान को राजकीय पद्धति से स्नान कराया जाता है। उन्हें दिन और उत्सव के अनुसार वस्त्र पहनाए जाते हैं। हर दिन के लिए अलग-अलग रंग के वस्त्र तय हैं। उत्सवों के अवसर पर वे पीले वस्त्र पहनेंगे।

बाल भोग और शृंगार आरती का शेड्यूल
बाल भोग, शृंगार आरती के बाद प्रभु दर्शन देते हैं। यह पूरी प्रक्रिया सुबह लगभग 6:30 बजे तक संपन्न होती है। दर्शनों के बाद करीब 9:30 बजे कुछ देर के लिए पट बंद होते हैं। 5 वर्ष की अवस्था में राजकुमार लगातार दर्शन नहीं दे सकते, इसलिए उन्हें सहज किया जाता है। भोग लगाया जाता है। कपड़े ठीक किए जाते हैं। फिर 11:30 बजे तक दर्शन का क्रम चलता है।

फिर होता है राजभोग
11:30 बजे राजभोग लगता है। इसकी पद्धति भी तय है। 12 बजे राजभोग आरती होती है। राजभोग के पद सुनाए जाते हैं। संगीत की सेवा होती है। भगवान लगभग आधा घंटा सबको दर्शन देते हैं। भगवान सौलभ्य गुण से परिपूर्ण हैं, वे सभी को दर्शन देते हैं और 12:30 बजे मध्यान्ह विश्राम शुरू हो जाता है। दोपहर ढाई बजे के बाद उन्हें फिर से जगाया जाता है। फिर से भोग लगाया जाता है और आरती होती है। इसके बाद दर्शन शुरू होते हैं। शाम 6:30 बजे संध्या आरती होती है। इस बीच में भी एक बार ब्रेक लिया जाता है।

शयन आरती के बाद पहनाते हैं वस्त्र
रात करीब 8:00-8:30 बजे शयन आरती होती है। शयन आरती से पहले भोग लगाया जाता है। प्रभु को संगीत सुनाया जाता है। भगवान को रोज चारों वेद सुनाए जाते है। राजा दशरथ स्वयं वेदों के ज्ञाता थे और भगवान राम के बारे में कहा जाता है कि वेद उनकी श्वास हैं। प्रभु के शयन के अनुरूप वस्त्र पहनाए जाते हैं। बिस्तर बिछाया जाता है। ठंड के मौसम में हीटर और गर्मी में एसी लगाया जाएगा। करीब आधा घंटा फिर दर्शन देते हैं। इसके बाद भगवान को शयन कराया जाता है। शयन के समय बाहर आते समय अर्चक द्वारपाल से बोल कर निकलते हैं कि भगवान को रात में कुछ जरूरत हो तो उनका ध्यान रखें। भगवान के पास पीने के लिए पानी रखा जाता है, ताकि उन्हें रात में प्यास लगे तो वे पानी पी सकें।

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