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फेमस नाटककार गजराज नागर से खास बातचीत, 40 सालों में रंगमंच से जुड़े; ताजमहल नाटक इन्होंने ही बनाया, बताया कैसी है रंगमंच की दुनिया?

उमाकांत त्रिपाठी। पिछले 40 सालों से रंगमंच की दुनिया से जुड़े फेमस नाटककार गजराज नागर से खबर इंडिया की टीम ने खास बातचीत की है। नाटकों की दुनिया में बेहद प्रसिध्द नाटकों में एक्टिंग, स्क्रिप्टिंग राइटिंग और डायरेक्शन भी करते हैं। नए एक्टर्स को ट्रेनिंग देने के साथ-साथ वो कई थिएटर वर्कशाप्स भी चलाते हैं। कई नाटकों को डायरेक्ट कर चुके गजराज के फेमस नाटक सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक, कैद – ए – हयात, शंकुतला की अंगूठी, छोटे सैय्यद बड़े सैय्यद और ताजमहल रहे हैं। गजराज कई नाट्य संस्थाओं के संस्थापक भी रहे हैं। उनके द्वारा निर्देशित ताजमहल का टेंडर नाटक बहुत चर्चित रहा, जिसके लेखक अजय शुक्ला थे। गजराज नागर का मानना है कि ताजमहल का टेंडर नाटक ने उन्हें अभिनेता और निर्देशक के रूप में बहुत बड़ी पहचान तो दिलाई ही है। साथ में दर्शकों का बेहिसाब प्यारऔर मान सम्मान भी मिला है। पढ़िए उनसे किए सवाल जवाबों का ये सिलसिला…

सवाल- अपने ताजमहल का टेंडर करने की पहली बार कब सोचा ?

जवाब-ताजमहल का टेंडर नाटक का पहला शो हमने पहली बार 2003 में किया .मेरे एक पुराने साथी थे अनिल शर्मा 1989 वाईएमसी थिएटर में मेरे साथ थे . उस समय हम नाटकों में साथ ही अभिनय कर रहे थे . अशोक पुरंग जी के निर्देशन में साल 2000 में मैं ऑथेलो नाटक की तैयारी कर रहा था .अपने ही एक स्टूडेंट उमेश दीक्षित की संस्था के लिए .क्योंकि ऑथेलो में कास्ट काफी बड़ी है . मुझे अनुभवी अभिनेताओं के साथ-साथ नए अभिनेताओं को भी ट्रेंड करना था .नाटक का निर्देशन भी करना था और अपने किरदार पर भी काम करना .खुद ही कॉस्टयूम और प्रॉप्स बनानी थी। इसलिए ऑथेलो नाटक को करने में मुझे नौ महीने लगे .इस दौरान अनिल अक्सर मुझसे मिलने आया करते थे . एक दिन उन्होंने इच्छा ज़ाहिर की कि वह निर्देशन करना चाहते हैं .पुराना साथी होने के कारण मैंने कहा ठीक है . आप ऑथेलो के बाद कर लेना . मैंने अपने अभी तक के सफर में ज़्यादातर लोगों को बिना किसी लालच केप्लेटफार्म दिया है। इसमें कलाकार, लेखक और निर्देशक सभी हैं। साल 2002 में मैंने उन्हें अपना प्लेटफार्म दिया . तय हुआ कि हम ताजमहल का टेंडर का निर्देशन साथ मिलकर करेंगे . अनिल की बहुत इच्छा थी कि ताजमहल का टेंडर करने की, इस तरह 2003 में हमने पहला शो किया ताजमहल के टेंडर किया। स्वर्गीय श्री पंचानन पाठक स्मृति सप्ताहांत नाट्य समारोह 2003 के फेस्टिवल में भी हमने इसका शो किया। हम दोनों में मिलकर ताजमहल के टेंडर के बहुत सारे सफल शो किए। जो भी हमारा शो देखाता हैरान रह जाता। हम दोनों निर्देशन के साथ-साथ अभिनय भी करते थे .मैं उसमें शाहजहां की भूमिका निभाता था और अनिल शर्मा गुप्ता जी की। उस समय हम दोनों की जोड़ी काफी चर्चित रही। फिर कुछ समय बाद वह अलग हो गए।

सवाल- मनोज बाजपेई और डायरेक्टर अनुभव सिन्हा के साथ काम करने का अनुभव बताएं

जवाब-वाईएमसीए ने थिएटर वर्कशॉप शुरू की थी, जिसमें मैंने अप्लाई किया . उसमें मेरा 1989 में सिलेक्शन हो गया वह एक्टिंग बेस थिएटर वर्कशॉप सिर्फ तीन महीने की थी। उस वर्कशॉप के डायरेक्टर अशोक पुरंग थे। वर्कशॉप के बाद वाईएमसीए में थिएटर चलता रहा। वहीं पर हमारे साथ में मनोज बाजपेई, अनुभव सिन्हा, ज्योति डोगरा, राजीव सक्सेना, अरुण कोचर और भी तमाम लोग थे।आज जो बड़े नाम है

सवाल-ताजमहल का टेंडर के अबतक कितने शो कर चुके हैं

जवाब-हम साल 2003 से लगातार इसका शो करते आ रहे हैं, कितने शो किये मुझे तो गिनती याद है नहीं। ताजमहल का टेंडर ही नहीं किसी भी नाटक की गिनती याद नहीं . बस करता चला आ रहा हूं .

सवाल-आप शो हॉल बुक करके करते हैं या संस्थाओं के लिए करते हैं

जवाब-स्वयं ऑडिटोरियम बुक करके भी करते हैं . विभिन्न संस्थाओं के लिए भी करते हैं . वर्कशॉप बेस भी करते हैं . मैंनेओरिएंटल इंश्योरेंस के लिए भी किया है . रेलवे के लिए भी किया है . मानव अधिकार आयोग के लिए भी किया है . गंगाराम हॉस्पिटल के डॉक्टरों के लिए किया है . मिनिस्ट्री ऑफ़ सोशल एनर्जी के लिए भी किया है . और भी बहुत सारी संस्थाओं के लिए किया है . कंपनियों के स्टाफ को ट्रेंड करके उन्ही के साथ भी शो किए हैं

सवाल-शाहजहां का किरदार हमेशा क्या आप ही निभाते हैं?

जवाब-साल 2003 मैं पहले शो से लेकर 2008 तक लगातार में शंहाजहां के किरदार को करता रहा। हां ओरिएंटल इंश्योरेंस के लिए जब मैंने किया तो वहां के स्टाफ ने ही सारे चरित्र किए शाहजहां की भूमिका में सुरेश सोलंकी थे . उसने भी शाहजहां का रोल बख़ूबी किया। उसे भी लोगों ने खूब पसंद किया। साल 2010 के बाद जितने भी शो हुए. ज्यादातर शांहजहां का किरदार राहुल गुलाटी ने निभाया है। उसने भी बेमिसाल अभिनय किया है . लोग शाहजहां के रूप में उसके अभिनय के फैन है.उसकी आज भी खूब सराहना करते हैं . वैसे भी राहुल गुलाटी अपना आप में गज़ब का एक्टर हैं। असम के फेस्टिवल में मनीष पंवार ने भी शांहजहां का किरदार अच्छे से किया है . उज्जवल मुद्गल ने भी शांहजहां का रोल किया है।


सवाल- शाहजहां को लेकर आपके क्या अनुभव रहे
जवाब-जब मैंने पहली बार शंहाजहां किया . वह भी कमाल का ही अनुभव है . मैंने 1985 से लेकर और 2002 तक किसी भी हास्य नाटक में किसी तरह का चरित्र नहीं किया था . सच बताऊं तो मुझे विश्वास भी नहीं था कि मैं हास्य रस में एक्टिंग कर सकता हूं .लेकिन मुझसे ज़्यादा विश्वास अनिल को मुझ पर था . खैर रिहर्सल शुरू की . शुरू में काफी मुश्किल लगा . दिन-रात मेहनत की . हर समय चरित्र के बारे में सोचते रहना . अगर दिमाग़ में कोई आईडिया आया तो उसको इंप्लीमेंट करना . बार-बार उसका रियाज़ करना . दोनों के लगातार सहयोग से यह शो काफी काफी सफल रहा . पहला शो जिसने भी देखा सभी को अच्छा लगा . सभी कलाकारों ने खूब मेहनत की . अगर कोई भी हमारे शाहजहां को देखता तो देखता ही रह जाता ताकि ऐसा भी कोई राजा होता है . जो अजीब अजीब सी हरकतें करता है . पर लोग भरपूर आनंद लेते थे . धीरे-धीरे जैसे हमने शो करने शुरू किये . शाहजहां का चरित्र जो हमने डिजाइन किया था . अभ्यास करते-करते मेरे शरीर में रच बस गया . जिसने भी मुझे शाहजहां के किरदार में अभिनय करते देखा हमेशा के लिए मेरा फैन होगया .हर वर्ग के दर्शकने मुझे खूब प्यार और मान सम्मान दिया . कई बार तो ऐसा हुआ मुझे राह चलते गाड़ी रोक कर दर्शको ने पहचाना है . कितने लोगों का सवाल होता कि कैसे करते हो . मैं तो मानता हूं . सब ईश्वर की इच्छा से ही होता है . ईश्वर की कृपा ही थी जो मैं शांहजहां के किरदार को अच्छे से कर पाया .मुझे तो लगता है . वही रास्ते बंद करता . वही खोल भी देता है।

सवाल-नाटक शुरू करने से पहले क्याआपको अंदाज़ा था कि आपको इतनी सफलता मिलेगी ?

जवाब- ज़रा सा भी अंदाजा नहीं था . हम दोनों से पहले भी लोग ताजमहल का टेंडर कर चुके थे . और कर रहे हैं . मैंने पहले कभी भी किसी का ताजमहल का टेंडर नहीं देखा . आज भी मैं दिन प्रतिदिन हो रहे समाज के बीच के अनुभवों को अपनी कल्पनाओं की डोर का ताना-बाना बुनकर दर्शकों तक पहुंचाता हूं .

सवाल- राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय भी ताजमहल का टेंडर करता है .उसकी तुलना मेंआप क्या कहोगे?

जवाब- राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय एक बहुत बड़ी संस्था है . उसके पास बहुत सारे रिसोर्सेस है . वैसे भी उनका शो देखने का कभी संजोग बना हीं नहीं, अच्छा ही करते होंगे। और भी कई ग्रुपस करते हैं . स्कूल करते हैं .वैसे मैं भी नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में रहा हू . वहां दो बार फुल टाइम वर्कशॉप की है .आज की तारीख़ में तो मैं अपनी तुलना किसी से करता ही नहीं . हर कोई अपनी क्षमता लेकर पैदा होताहै . मैं जो था और जो हूं. उसी को देखता हूं . उसी को समझने की कोशिश करता हूं.अपनी संभावनाओं पर काम करता हूं . उन्हीं को तरासाने के लिए प्रयत्नशील रहता हूं. उन्हीं में विश्वास करता हूं .इसलिए तुलना मेरे लिए इस अर्थ में महत्व नहीं रखती . वैसे भी सभी निर्देशक अपनी पूरी ताकत लगाते हैं .अपने नाटक को सफल बनाने के लिए . ज़्यादातर ग्रुप बग़ैर रिसोर्स के नाटक कर रहे हैं . यह अपने में बहुत बड़ी बात हैऔर उपलब्धि भी है

सवाल- आपनेअपने नाटकों में कभी भव्य सेट लगाया है?
जवाब- नाटक की ज़रूरत के हिसाब से सेट लगाते हैं .मेरा ज़्यादातर फोकस परफॉर्मेंस पर होता. मै जिस कहानी को चुनता हूं . उसके बारे में मेरी पूरी कोशिश हो तो है कि उपलब्ध सुविधाओं के आधार पर उस कहानी को मैं दर्शकों को उस तरह दिखाने में सफल हुआ हूं . जैसा मैंने सोचा था . बस यही मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण है

सवाल-आपको क्या लगता है की ओटीटी और यूट्यूब के जमाने में थिएटर की क्या स्थिति है?

जवाब- इस संसार में स्थिर कुछ भी नहीं है . सब कुछ परिवर्तनशील है .हर बार कुछ ना कुछ नया आता जाता रहेगा कुछ ठहर जाएगा .थिएटर तो सदियों से था है और रहेगा . खत्म होने का सवाल ही नहीं उठता .हां इसमें परिवर्तन होते रहेंगे .थिएटर के ठहरे रहने का मुख्य कारण चाहत है .जो हस्तांतरित होती रहती है . प्रेरणास्वरूप अथवा आंतरिक इच्छाओं के कारण पीढ़ी दर पीढ़ी बनीर हेगी . यहां पीढ़ी काअर्थ पारिवारिक नहीं है .रंगमंच से जुड़े लोगों से और जो जुड़ेंगे उनसे है . हां इसके आर्थिक स्वरूप के विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता .आज भी जो लोग रंगमंच कर रहे हैं . वह आर्थिक कारणों सेन हीं बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति से ये कर रहे हैं।

सवाल- आपको क्या लगता है नाटक कम क्यों लिखा जा रहे?

जवाब- हम अगर भारत की बात करेंतो नाटकों का लेखन संस्कृत नाटकों से सतत् ज़ारी रहा . नाटक लिख तो आज भी जा रहे हैं . लेकिन ज़्यादातर नाटककार पुराने नाटकों का मंचन करते हुए दिखते हैं या फिर कुछ निर्देशक अपने लिखे हुए नाटक या फिर कहानियों पर आधारित नाटकों का मंचन कर रहे हैं . जैसे मैं भी अपने नाटक लिखता हूं . कहानियों पर आधारित नाटक लिखता भी हूं और करता भी हूं . वैसे पहले के मुक़ाबले नाट्य लेखन के क्षेत्र में नाटकों की काफी कमी दिख रही है . वरना तो एक से बढ़कर एक नाटककार पैदा हुए . मोहन राकेश, भीष्मसाहनी, गिरीश कर्नाड, बादल सरकार,डॉ शंकर शेष, जगदीश चंद्र माथुर, दुष्यंत कुमार,रामकुमार वर्मा, डॉ धर्मवीर भारती,डॉ गोविंद चातक जैसी तमाम लेखक हैं। इसका मुख्य कारण कोई एक तो है नहीं . मुझे तो लगता है किइसका मुख्य केन्द्रबिंदु धन है .वैसे तो धन हर युग में महत्वपूर्ण रहा है .लेकिन आज के युग में धन कुछ ज्यादा ही विशेष है . हर किसी को व्यक्तिगत सुविधाएं चाहिये . उन व्यक्तिगत सुविधाओं में बहुत सारी चीजें आ जाती हैं .जब कोई लेखकपूर्ण समर्पण भाव सेनाटक लिखता है तो उसके बदले उसे धन तो मिलता नहीं है. मान सम्मान ही मिलता है . मुझे ऐसा महसूस होता है कि पहले नाटककारों का ध्यान धन की तरफ नहीं था . ध्यान था तो सिर्फ अच्छे नाटक की रचना करने पर .उसे समय के हालात अलग थे और आज की हालत बिलकुल अलग है .नाटक लिखने में वह अपनी पूरी सर्जनात्मक शक्ति लगा देते थे . बगैर धन की लालसा के . मेटेरिलिस्टिक वर्ल्ड में इतनी सुविधाएं इतनी चीजें आ गई है .शिक्षा मेडिकल लिविंग स्टैंडर्ड हर चीज के लिए अच्छा साधन चाहिए . इसलिए हमारा हर एक्शन धन से जुड़ गया है . अगर लेखक एक लंबा समय लगाकर . दुनिया भर की रिसर्च करने के बाद . कोई अच्छा नाटक लिखते भी हैं तो उसे क्या ही मिल जाएगा .थिएटर ग्रुप के पास इतना पैसा नहीं है किउन्हें अच्छे खासी रॉयल्टी दे सके . और आम दर्शकों में नाटक पढ़ने का चलन है नहीं . सिर्फ देखने का है . पब्लिशर से भी कुछ ज़्यादा उम्मीद की नहीं जा सकती . लेखक फिर करे भी तो क्या करें ?

सवाल- शाहजहां का टेंडर आपको बाईचेंस मिला या आपकी मेहनत से मिला?

जवाब- ऐसा नहीं था कि शहाजहां का किरदार पहले ही दिन हिट हो गया था .मैं 1985 से थिएटर करता आ रहा हूं . मैंने कई संस्थाओ से प्रशिक्षण लिया है . राष्ट्रीय नाटय विद्यालय से वर्कशॉप्स की हैं .अभिनय और तकनीकी दोनों. विभिन्न थिएटर ग्रुपस के साथ काम किया है . उसका अनुभव मेरे शरीर की मेमोरी में फीड है .वह भी हमेशा आपके काम आता है .प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से . फिर हमें जो किरदार मिलता है . लगातार उसको तरासने के लिए उस पर काम करते हैं . नए-नए आयामों के साथ . एरर मेथड का प्रयोग करते हैं . अभिनय गणित का सवाल नहीं है . जिसे किसी फार्मूले से सॉल्व किया जा सके .हालांकि अभिनय की बहुत सारी थियोरीज हैं . कई बार वह भी काफी नहीं होती है . किरदार को लेकर आपका लगातार मंथनऔर रियाज़ बहुत महत्वपूर्ण है . शाहजहां के किरदार को करने के लिए मैं लगातार उसपर काम करता रहा . थिएटर में एक सुविधा होते हैं कि आप अगले शो में अपनी गलतियों को सुधार सकते हैं .अपने किरदार को और इंप्रूव कर सकते हैं . लेकिन फिल्म में ऐसा नहीं है. एक बार बन गई तो बन गई . शाहजहां के किरदार को बनाने में मैंने लंबा समय दिया है . बनाना में इसलिए कह रहा हूं कि इसे मैंने खुद से ही बनाया है . बड़े ही अनएक्सपेक्टेड रिएक्शन है . जो काम करते-करते बनते चले गए . किसी भी किरदार को करने में समय और मेहनत दोनों लगतीहै . कुछ भी रेडीमेड नहीं होता है .

सवाल- अब भी आप शाहजहां का कैरेक्टर करते हैं?

जवाब-अभी तो नहीं करता . शाहजहां का जो चरित्र है उसमें उसके 25 साल का सफर है. चरित्र के जो शुरूआती सालों में उसके जो लटके झटके हैं .वहब हुत शार्प हैं . मैं जिस उम्र में हूं . उस उम्र में इस तरह की एनर्जी के साथ करना थोड़ा सा कठिन है .हां लेकिन संभव नहीं है . भविष्य में कभी कोई ऐसी स्थिति बनी और ईश्वर की इच्छा हुई तो कोशिश करूंगा।

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