उमाकांत त्रिपाठी।अमित शाह ने जब साल 2019 में केंद्रीय गृह मंत्री का पदभार संभाला था, तब वामपंथी उग्रवाद को जम्मू-कश्मीर से भी बड़ी चुनौती माना जा रहा था. लेकिन अमित शाह ने इस चुनौती को स्वीकार किया और उनका दावा है कि मार्च 2026 तक देश नक्सली खतरे से पूरी तरह मुक्त हो जाएगा. इंडिया टुडे के ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा और सीनियर एसोसिएट एडिटर राहुल नरोन्हा ने अमित शाह से नक्सली खतरे से निपटने की मोदी सरकार की रणनीति के बारे में विस्तार से बातचीत की है.
कैसे तय की मार्च 2026 की डेडलाइन?
पिछले पांच दशक से देश के लिए समस्या बन चुके नक्सलियों के खात्मे के लिए इतनी सख्त डेडलाइन रखने का आत्मविश्वास उनमें कैसे आया? इस सवाल पर अमित शाह ने कहा कि महज आत्मविश्वास से नक्सलवाद का खात्मा होने से रहा. मैंने पहले से ही कर लिए काम के बूते पर यह बयान दिया है. रणनीति के बारे में बात करते हुए अमित शाह ने कहा कि- 2019 केंद्रीय गृह मंत्री की कुर्सी संभालने के बाद मुझे बताया गया कि नक्सल या वामपंथी उग्रवाद का मुद्दा कश्मीर से भी बड़ा है. एक मायने में विकास की कमी से उपजा असंतोष नक्सलवाद की वजह माना जा सकता है.
आजादी के बाद से 1990 के दशक तक हमारे देश में संसाधनों की कमी थी. व्यवस्थित विकास संभव न था, लिहाजा ये इलाके प्रगति में पिछड़े रहे. वामपंथी विचारधारा ने लोगों के मन में यह बात बैठाने के लिहाज से इस इलाके को खासी उपजाऊ जमीन पाया कि हिंसा से विकास का रास्ता खुलता है.उन्होंने कहा कि- नक्सलियों के खिलाफ मोदी सरकार के मास्टरप्लान का पहला पहलू बंदूक उठाने वालों और हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त और निर्मम कार्रवाई करना था. हमने इलाके में तैनात राज्य पुलिस बलों और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) के प्रशिक्षण, एकीकरण और क्षमता निर्माण के जरिए अधिकतम बल का इस्तेमाल किया. हमने दबदबे के लिए अधिक रेंज वाली आधुनिक असाल्ट राइफलों और इसी तरह के दूसरे हथियारों का इस्तेमाल किया.
7500 नक्सलियों ने किया सरेंडर-शाह
शाह ने कहा कि- पिछले 10 साल में लगभग 7,500 नक्सलियों ने सरेंडर किया है, जिसका मुख्य कारण हमारे ऑपरेशन में इजाफा है. बदले में वे भविष्य में होने वाले सरेंडर में भूमिका निभाते हैं. इनमें आत्मसमर्पण करने वाले कई नक्सली जिला रिजर्व गार्ड समेत राज्य पुलिस में आ गए हैं. वे इलाके और नक्सली रणनीति को अच्छी तरह जानते हैं और हमारे लिए ताकत बन गए हैं. सरेंडर करने वाले नक्सलियों का उपयोग बड़ी योजना में जनशक्ति के अनोखे इस्तेमाल की मिसाल है और इसका एक मॉडल के रूप में विश्लेषण और अध्ययन किया जाना चाहिए.














