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किसने किया था UPI का पहला ट्रांजैक्शन ? 10 साल में 13,000 गुना की छलांग, पीएम मोदी ने भी किया सलाम

खबर इंडिया की।भारत के डिजिटल पेमेंट सिस्टम की तस्वीर पिछले एक दशक में पूरी तरह बदल गई है। UPI ने 10 साल का सफर पूरा कर लिया है और इस दौरान छोटे दुकानदार से लेकर बड़े कारोबारी और आम मोबाइल यूजर तक, भुगतान का तरीका बदल गया है। 2016 में जहां UPI के जरिए सालभर में सिर्फ 1.78 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए थे, वहीं FY 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर 24,162 करोड़ से अधिक हो गया। यानी एक दशक में UPI के सालाना ट्रांजैक्शन वॉल्यूम में करीब 13,000 गुना उछाल आया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी UPI के 10 साल पूरे होने पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर इस उपलब्धि को भारत की डिजिटल पेमेंट यात्रा का बड़ा पड़ाव बताया। उन्होंने लोगों से अपने UPI अनुभव साझा करने और यह बताने को कहा कि इस सिस्टम ने उनकी जिंदगी को किस तरह प्रभावित किया है।

10 साल में UPI ने कितनी बड़ी छलांग लगाई?

सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, FY 2016-17 में UPI पर सालाना ट्रांजैक्शन की संख्या 1.78 करोड़ थी। FY 2025-26 में यह आंकड़ा 24,162 करोड़ से ज्यादा हो गया। इसी अवधि में UPI के जरिए होने वाले ट्रांजैक्शन की कुल वैल्यू भी ₹0.07 लाख करोड़ से बढ़कर करीब ₹314 लाख करोड़ पहुंच गई।

इसका मतलब है कि सिर्फ ट्रांजैक्शन की संख्या ही नहीं बढ़ी, बल्कि UPI के जरिए होने वाले भुगतान का आर्थिक पैमाना भी कई हजार गुना बढ़ गया। सरकार के अनुसार, FY 2025-26 में भारत के डिजिटल पेमेंट्स में UPI की हिस्सेदारी करीब 84 फीसदी रही।

जुलाई 2026 में भी UPI ने नया रिकॉर्ड बनाया। इस महीने प्लेटफॉर्म पर करीब 2,366 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए और इनकी कुल वैल्यू लगभग ₹29.88 लाख करोड़ रही। जुलाई 2026 तक 741 बैंक UPI नेटवर्क पर लाइव थे।

आज औसतन करीब 66 करोड़ UPI ट्रांजैक्शन रोजाना हो रहे हैं। यही वजह है कि UPI को दुनिया के सबसे बड़े रियल-टाइम पेमेंट सिस्टम के तौर पर पहचान मिली है। सरकार के अनुसार, 2025 में दुनिया के रियल-टाइम पेमेंट वॉल्यूम में UPI की हिस्सेदारी करीब 49 फीसदी थी।

किसने किया था पहला UPI ट्रांजैक्शन?

UPI की कहानी 11 अप्रैल 2016 से शुरू हुई, जब RBI के तत्कालीन गवर्नर डॉ. रघुराम राजन ने मुंबई में UPI का पायलट लॉन्च किया। NPCI के अनुसार, इसी दिन UPI का सॉफ्ट लॉन्च हुआ था।

इसके बाद 25 अगस्त 2016 को UPI को आम ग्राहकों के लिए आधिकारिक तौर पर लाइव किया गया। शुरुआत में 21 बैंक इस सिस्टम से जुड़े थे। NPCI की शुरुआती घोषणा के मुताबिक, UPI को इस तरह तैयार किया गया था कि मोबाइल ऐप के जरिए इंटरऑपरेबल तरीके से तुरंत पैसे भेजे और प्राप्त किए जा सकें।

यानी आज जिस QR कोड को स्कैन करके कुछ ही सेकंड में भुगतान करना आम बात है, उसका शुरुआती सफर एक छोटे पायलट से शुरू हुआ था।

IMPS से निकला UPI का आइडिया

UPI के पीछे का विचार अचानक नहीं आया था। इसके विकास की कहानी IMPS यानी Immediate Payment Service से भी जुड़ी है। IMPS पहले से ही रियल-टाइम बैंक ट्रांसफर की सुविधा देता था, लेकिन इसे व्यापक मर्चेंट पेमेंट और नए डिजिटल बिजनेस मॉडल के लिए पूरी तरह डिजाइन नहीं किया गया था।

NPCI के पूर्व प्रमुख एपी होता के अनुसार, UPI को विकसित करने का उद्देश्य IMPS के भरोसेमंद रियल-टाइम सेटलमेंट इंजन का इस्तेमाल करते हुए उससे कहीं ज्यादा खुला और आसान सिस्टम तैयार करना था।

इसमें मर्चेंट पेमेंट को आसान बनाना, गैर-बैंक पेमेंट प्रोवाइडर्स को शामिल करना, ई-कॉमर्स पेमेंट फेलियर को कम करना और API आधारित तकनीक को अपनाना प्रमुख लक्ष्य थे।

यही सोच आगे चलकर UPI की सबसे बड़ी ताकत बनी। एक ही सिस्टम के जरिए अलग-अलग बैंकों के खातों को जोड़ना और अलग-अलग ऐप्स के माध्यम से भुगतान करना संभव हुआ।

UPI की सफलता का सबसे बड़ा कारण क्या रहा?

UPI की सफलता के पीछे सिर्फ तेज पेमेंट ही नहीं, बल्कि इसका डिजाइन भी महत्वपूर्ण रहा। NPCI के अनुसार, UPI यूजर्स को एक ही ऐप में कई बैंक अकाउंट जोड़ने, फंड ट्रांसफर करने और मर्चेंट पेमेंट करने की सुविधा देता है। इसमें वर्चुअल पेमेंट एड्रेस, QR कोड और दो-स्तरीय ऑथेंटिकेशन जैसी सुविधाएं भी शामिल हैं।

इस मॉडल ने भुगतान को बैंक अकाउंट नंबर और IFSC जैसी लंबी जानकारी से काफी हद तक मुक्त कर दिया। दुकानदार के लिए QR कोड लगाना आसान हुआ और ग्राहक के लिए मोबाइल से भुगतान करना।

UPI का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू इसका ओपन और इंटरऑपरेबल मॉडल है। इसका मतलब है कि अलग-अलग बैंक और पेमेंट ऐप एक साझा नेटवर्क के जरिए आपस में भुगतान कर सकते हैं। इसी वजह से इसका इस्तेमाल छोटे दुकानदारों से लेकर ऑनलाइन शॉपिंग और बिल भुगतान तक तेजी से बढ़ा।

आज 11 देशों तक पहुंच चुका है UPI

भारत में सफलता हासिल करने के बाद UPI का प्रभाव देश की सीमाओं से बाहर भी बढ़ा है। सरकार के मुताबिक, UPI वर्तमान में 11 देशों में ऑपरेशनल है। इससे यह केवल घरेलू भुगतान प्रणाली नहीं रह गया, बल्कि भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की वैश्विक पहचान भी बन चुका है।

दुनिया के कई देशों में रियल-टाइम पेमेंट सिस्टम मौजूद हैं, लेकिन UPI का बड़ा अंतर इसका विशाल पैमाना, इंटरऑपरेबिलिटी और रोजमर्रा के छोटे भुगतानों में व्यापक इस्तेमाल है।

आज चाय की दुकान से लेकर किराना स्टोर, कैब, रेस्टोरेंट, ऑनलाइन खरीदारी और बिल भुगतान तक UPI का इस्तेमाल आम हो चुका है। इसने कैश रखने और छुट्टे पैसे की समस्या को भी काफी हद तक कम किया है।

आगे UPI के सामने क्या चुनौती है?

UPI की तेज वृद्धि के साथ सुरक्षा, फ्रॉड रोकने और सिस्टम को लंबे समय तक मजबूत बनाए रखने की चुनौती भी बढ़ रही है। करोड़ों लोग रोजाना इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं, ऐसे में साइबर फ्रॉड और गलत ट्रांजैक्शन से सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

सरकार और संबंधित संस्थाएं UPI को सुरक्षित बनाने के लिए रिस्क-बेस्ड ट्रांजैक्शन लिमिट, बेहतर सिक्योरिटी जरूरतों और फ्रॉड मॉनिटरिंग जैसे कदमों पर लगातार काम कर रही हैं।

वहीं, UPI ट्रांजैक्शन के मौजूदा बिजनेस मॉडल को लेकर भी चर्चा होती रही है। खासतौर पर मर्चेंट पेमेंट से जुड़े MDR यानी Merchant Discount Rate को लेकर बहस महत्वपूर्ण है। भविष्य में UPI के बढ़ते पैमाने के साथ इसके आर्थिक मॉडल में बदलाव होता है या नहीं, इस पर नजर रहेगी।

फिलहाल इतना तय है कि 10 साल में UPI ने भारत में पैसे भेजने और लेने का तरीका बदल दिया है। 2016 में 1.78 करोड़ सालाना ट्रांजैक्शन से शुरू हुआ सफर 2026 में 24,162 करोड़ से अधिक सालाना ट्रांजैक्शन तक पहुंच चुका है। यह सिर्फ किसी पेमेंट सिस्टम की ग्रोथ नहीं, बल्कि भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में आए बड़े बदलाव की कहानी भी है।

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