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इस वजह से शांत है गृहमंत्री अमित शाह, चिकेन नेक से प्रहार डॉक्ट्रिन तक, कुछ तो बड़ा होने वाला है?

उमाकांत त्रिपाठी।केंद्रीय गृहमंत्री Amit Shah इन दिनों सार्वजनिक तौर पर भले ही अपेक्षाकृत शांत नजर आ रहे हों, लेकिन पिछले कुछ दिनों में उनकी लगातार हुई अहम बैठकों और गतिविधियों पर नजर डालें तो एक अलग तस्वीर सामने आती है। देश की आंतरिक सुरक्षा से लेकर सीमावर्ती इलाकों, अवैध घुसपैठ, आतंकवाद, गोरखा समुदाय के मुद्दे, परिसीमन और मणिपुर में NRC जैसे संवेदनशील विषयों पर Amit Shah की सक्रियता ने राजनीतिक और सुरक्षा गलियारों में चर्चा बढ़ा दी है।

समर्थक लंबे समय से Amit Shah को आधुनिक राजनीति के रणनीतिकार और चाणक्य के रूप में पेश करते रहे हैं। वहीं विपक्ष कई मौकों पर इस राजनीतिक उपमा का मजाक भी उड़ाता रहा है। संसद के मानसून सत्र के दौरान भी विपक्ष ने गृहमंत्री की सदन में मौजूदगी को लेकर सवाल उठाए थे। हालांकि, बाद में अमित शाह ने मीडिया के सामने आकर विपक्ष को सदन में चर्चा के लिए आने की चुनौती दी थी।

अब सवाल यह है कि अगस्त के इन कुछ दिनों में Amit Shah की लगातार बैठकों का व्यापक उद्देश्य क्या है? क्या यह केवल अलग-अलग प्रशासनिक और सुरक्षा बैठकों का हिस्सा है या इनके पीछे आने वाले समय के लिए कोई बड़ी रणनीति तैयार की जा रही है?

Amit Shah का प्रहार डॉक्ट्रिन पर फोकस

24 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में Amit Shah ने नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटजीज कॉन्फ्रेंस 2026 के दो दिवसीय सम्मेलन की शुरुआत की। इस सम्मेलन का फोकस राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल और रणनीतिक इनपुट साझा करने पर है।

इस दौरान आतंकवाद और कट्टरपंथ के खिलाफ देश की पहली ‘प्रहार डॉक्ट्रिन’ पर जोर दिए जाने की बात सामने आई। सुरक्षा के बदलते स्वरूप को देखते हुए यह पहल अहम मानी जा रही है। आज चुनौती केवल पारंपरिक आतंकवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि साइबर अपराध, नारकोटिक्स नेटवर्क, अवैध घुसपैठ, समुद्री सुरक्षा, इनफॉर्मेशन वॉरफेयर और बायोसिक्योरिटी जैसे कई नए मोर्चे भी सामने हैं।

यही वजह है कि Amit Shah की इस कॉन्फ्रेंस में मौजूदगी को केवल एक नियमित सरकारी कार्यक्रम के तौर पर नहीं देखा जा रहा। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अलग-अलग विभागों और एजेंसियों के बीच समन्वय मजबूत करने पर जोर आने वाले वर्षों की सुरक्षा नीति के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर Amit Shah की नजर

इससे पहले 22 अगस्त को Amit Shah ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण बैठक की अध्यक्षता की। रणनीतिक दृष्टि से यह इलाका बेहद संवेदनशील है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे आमतौर पर ‘चिकन नेक’ भी कहा जाता है, देश के पूर्वोत्तर राज्यों को बाकी भारत से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण भू-भाग है।

बैठक में क्षेत्र को अतिक्रमण से मुक्त रखने और अवैध घुसपैठ पर प्रभावी रोक लगाने जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। साथ ही क्षेत्र में होने वाले संभावित जनसांख्यिकीय बदलाव से जुड़े विषय भी चर्चा के केंद्र में रहे।

Amit Shah ने इस क्षेत्र की सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया। सिलीगुड़ी कॉरिडोर की संवेदनशील भौगोलिक स्थिति को देखते हुए केंद्र और राज्य एजेंसियों के बीच समन्वय को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यह बैठक इसलिए भी अहम है क्योंकि पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा, सीमावर्ती क्षेत्रों की निगरानी और अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण केंद्र सरकार के प्रमुख सुरक्षा एजेंडे में शामिल रहे हैं।

गोरखा मुद्दे पर राजनीतिक समाधान की कोशिश

सिलीगुड़ी कॉरिडोर से जुड़े सुरक्षा पहलुओं के साथ पश्चिम बंगाल के गोरखा समुदाय से संबंधित लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक मुद्दे पर भी Amit Shah ने पहल की है।

गोरखा समुदाय से जुड़े मुद्दों के स्थायी राजनीतिक समाधान के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित किए जाने की जानकारी सामने आई है। इस समिति का उद्देश्य संविधान के दायरे में रहते हुए एक व्यापक राजनीतिक समाधान का फ्रेमवर्क तैयार करना बताया गया है।

इससे पहले Amit Shah ने गोरखा समुदाय के सांसदों और विधायकों के साथ भी चर्चा की और उनकी समस्याओं को सुना। ऐसे में सुरक्षा और राजनीतिक समाधान को समानांतर तरीके से आगे बढ़ाने की कोशिश के तौर पर इस कदम को देखा जा सकता है।

गोरखा मुद्दा पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय से संवेदनशील विषय रहा है। इसलिए इस पर केंद्र की सक्रियता का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है।

परिसीमन के मुद्दे पर भी बढ़ी सक्रियता

20 अगस्त को Amit Shah ने तमिलनाडु के महाबलीपुरम में 31वें सदर्न जोनल काउंसिल समिट की अध्यक्षता की। इस बैठक में दक्षिण भारत के कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई।

बैठक में कावेरी जल विवाद और मेकेदातु डैम जैसे पुराने विषयों के साथ परिसीमन का मुद्दा भी चर्चा में आया। दक्षिण भारतीय राज्यों में परिसीमन को लेकर पहले से राजनीतिक चिंता रही है, खासकर लोकसभा सीटों के संभावित पुनर्विन्यास को लेकर।

यही वजह है कि Amit Shah की अध्यक्षता में हुई इस बैठक को केवल अंतरराज्यीय विवादों के समाधान की सामान्य प्रक्रिया तक सीमित नहीं माना जा रहा। परिसीमन का मुद्दा आने वाले समय में केंद्र और दक्षिणी राज्यों के बीच राजनीतिक संवाद का बड़ा विषय बन सकता है।

मणिपुर में NRC और जनगणना पर भी नजर

मणिपुर में जनगणना से पहले NRC का मुद्दा भी लगातार चर्चा में है। राज्य में नागरिकता और अवैध घुसपैठ से जुड़े सवालों को लेकर अलग-अलग समुदायों के बीच मतभेद हैं। कुछ वर्ग जनगणना से पहले NRC की मांग कर रहे हैं, जबकि कुकी-जो समुदाय से जुड़े लोगों की ओर से इसका विरोध किए जाने की बात सामने आती रही है।

इसी संदर्भ में 18 अगस्त को Amit Shah की मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह से मुलाकात भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जनगणना और NRC से जुड़े विषय गृह मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र से संबंधित हैं, इसलिए इस मुद्दे पर केंद्र की भूमिका काफी अहम है।

मणिपुर की संवेदनशील स्थिति को देखते हुए वहां की राजनीतिक और सुरक्षा परिस्थितियों पर केंद्र की लगातार नजर बनी हुई है। ऐसे में Amit Shah की बैठकों को राज्य में स्थायी शांति, प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा से जुड़े व्यापक प्रयासों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

क्या Amit Shah की बैठकों के पीछे है बड़ी रणनीति?

पिछले कुछ दिनों की घटनाओं को एक साथ जोड़कर देखें तो Amit Shah का फोकस कई महत्वपूर्ण मोर्चों पर दिखाई देता है। एक तरफ राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद, कट्टरपंथ और साइबर अपराध जैसी सुरक्षा चुनौतियां हैं, तो दूसरी तरफ सिलीगुड़ी कॉरिडोर जैसे रणनीतिक क्षेत्र की सुरक्षा का सवाल है।

इसके साथ ही गोरखा समुदाय से जुड़े राजनीतिक समाधान, दक्षिण भारत में परिसीमन को लेकर संवाद और मणिपुर में NRC तथा जनगणना जैसे संवेदनशील मुद्दे भी उनके एजेंडे में नजर आ रहे हैं।

यानी Amit Shah की हालिया गतिविधियों में सुरक्षा और राजनीति दोनों का मेल दिखाई देता है। इन मुद्दों का असर सिर्फ तत्काल प्रशासनिक फैसलों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि आने वाले महीनों में देश की आंतरिक सुरक्षा और राजनीतिक विमर्श पर भी पड़ सकता है।

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इन बैठकों के पीछे कोई एक व्यापक राजनीतिक योजना है। लेकिन इतना जरूर है कि Amit Shah की हालिया सक्रियता कई ऐसे विषयों पर केंद्रित है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा और आने वाली राजनीतिक चुनौतियों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं। यही वजह है कि गृहमंत्री की इन बैठकों पर राजनीतिक दलों के साथ-साथ सुरक्षा विशेषज्ञों की भी नजर बनी हुई है।

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