उमाकांत त्रिपाठी।छत्तीसगढ़ आमतौर पर बीजेपी का गढ़ माना जाता है. 2019 के लोकसभा चुनाव को छोड़कर बीजेपी का पिछले सभी चार लोकसभा चुनावों में 11 में 10 सीटों के साथ राज्य में शानदार जीत का रिकॉर्ड है. दरअसल, 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने राज्य में भारी जीत दर्ज की थी और इसी के साथ पार्टी ने 2019 में दो लोकसभा सीटें भी अपने खाते में करने में कामयाब रही थी. हालांकि, इस बार भी कोई खास अंतर नजर नहीं आ रहा है.माना जाता है कि कांग्रेस ने मौजूदा लोकसभा चुनाव में सीमित संसाधनों के साथ 11 में 4-5 सीटों पर सफलता से चुनाव लड़ा है. इनमें जांजगीर चांपा, महासमुंद, राजनांदगांव, कांकेर और कोरबा जैसी सीटें हैं, जहां कंग्रेस के पक्ष में हवा रही है. बीजेपी यहां अपने एक्सपेरिमेंट के लिए भी जानी जाती है, जहां पार्टी ने इस बार सिर्फ दो उम्मीदवारों (संतोष पांडे और विजय बघेल) को छोड़कर बाकी 9 सीटों पर नए चेहरे को उम्मीदवार बनाया था.
वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार बोले
दूसरी तरफ, कांग्रेस ने अपने पूर्व कैबिनेट मंत्रियों पर दांव लगाया था, जिनके बारे में पार्टी के भीतर माना जाता है कि उनके पास विरोधियों की जमीनें हिलाने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं. मसलन, आइए इस रिपोर्ट में जानते हैं कि आखिर वो क्या वजहें रहीं, जिससे बीजेपी को एक बार फिर राज्य में शानदार जीत मिलती नजर आ रही है?
मोदी लहर: छत्तीसगढ़ में पहले तीन चरणों में मतदान हुआ जो माना जाता है कि बीजेपी के लिए बेहतर साबित हुआ है. वरिष्ठ पत्रकार नीरज मिश्रा कहते हैं कि, चुनाव शुरू होने से पहले राम नवमी और हनुमान जयंती के त्यौहारों से भी भगवा समर्थक मतदाता लामबंद हो सके, जिसका बीजेपी को फायदा हुआ.
वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार मानते हैं, “छत्तीसगढ़ में बीजेपी के अभियान में निर्विवाद मोदी लहर थी और बीजेपी के हर चुनावी वादे को मोदी की गारंटी के रूप में लेबल किया जा रहा था. अगर बीजेपी राज्य की सभी 11 सीटों पर जीत हासिल कर लेती है, तो इसे अजेय मोदी लहर कहना आश्चर्यजनक नहीं होगा.”
महतारी वंदन योजना: लोकसभा चुनाव शुरू होने से ठीक पहले राज्य की बीजेपी सरकार ने महतारी वंदना योजना की रणनीतिक रूप से दो-तीन किस्तें जारी कर दी थी, जिससे महिला मतदाताओं को लामबंद किया जा सका. हाल ही के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने वादा किया था, जिसे पूरा करने से माना जाता है कि मतदाताओं का विश्वास बढ़ा और पार्टी को भारी संख्या में महिलाओं का वोट मिला.महिला मतादाताओं को लुभाने के लिए कांग्रेस पार्टी ने भी महालक्ष्मी योजना लॉन्च की थी. इसमें कोई दो राय नहीं है कि इससे बीजेपी के महतारी योजना को झटका लगा लेकिन पार्टी को फिर भी महतारी योजना का अच्छा लाभ होने का अनुमान है.
कांग्रेस का संविधान का मुद्दा: छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जाति के बीच कांग्रेस पार्टी की अच्छी पैठ मानी जाती है. यही वजह है कि हालिया विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने बिलासपुर क्षेत्र की दस में छह सीटें जीतने में कामयाब हुई थी. लोकसभा चुनाव में भी माना जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी को इस समुदाय का अच्छा-खासा वोट मिला है, जो राहुल गांधी के संविधान बचाने जैसे बयानों से लामबंद हुए.
वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार बोले
वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार मानते हैं, “छत्तीसगढ़ में कई लोगों को लगता है कि बीजेपी के “संविधान बदल देंगे, आरक्षण खत्म कर देंगे” पर कांग्रेस के रुख ने एससी/एसटी मतदाताओं को कुछ हद तक डराया है, क्योंकि राज्य की आधी सीटें एससी/एसटी आरक्षित हैं. यह कांग्रेस के वोटों में योगदान दे सकता है क्योंकि विधानसभा चुनावों में भी एससी मतदाताओं को उन्होंने मजबूती से बनाए रखा है.”
कांग्रेस की संरचनात्मक खामी: जहां बीजेपी ने ‘मोदी की गारंटी’ पर चुनाव लड़ा, तो वहीं कांग्रेस ‘भूपेश के पांच साल’ पर अड़ी रही. साथ ही, पार्टी की तरफ से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की जोड़ी ने भी राज्य में सिर्फ कुछ ही रैलियां कीं, जो पार्टी की संरचनात्मक कमजोरी को दिखाता है.
मसलन, कमजोर प्रचार-प्रसार से माना जाता है कि पार्टी मतदाताओं तक पहुंचने में नाकाम रही, जहां भूपेश बघेल, देवेंद्र यादव और बीरेश ठाकुर जैसे नेताओं ने राज्य में पार्टी का अभियान संभाला. माना जाता है कि अगर बेहतर प्रबंधन होता तो पार्टी और बेहतर प्रदर्शन कर सकती थी. अब एग्जिट पोल में जहां बीजेपी को 10-11 सीटें मिलती नजर आ रही हैं, 4 जून को ही स्पष्ट हो पाएगा कि आखिर राज्य में कौन सी पार्टी अपना परचम लहराने में कामयाब हो पारती है.














