उमाकांत त्रिपाठी।यूपी जिला जौनपुर यह शहर आजकल चर्चा में है। वजह है बाहुबली व पूर्व सांसद धनंजय सिंह को 7 साल की जेल होना। धनंजय पर एक-दो नहीं बल्कि पूरे 43 मुकदमे दर्ज हैं। लेकिन सजा पहली बार ही सुनाई गई है।राजनीति और अपराध की दुनिया में धनंजय की दिलचस्पी बचपन से रही। वह कुछ बड़ा करना चाहता था।
धनंजय सिंह ने राजनीति को बनाया अपनी मंजिल
राजनीति और अपराध की दुनिया में धनंजय की दिलचस्पी बचपन से रही। वह कुछ बड़ा करना चाहता था। इसलिए उसने जरायम की दुनिया में एंट्री ली और फिर राजनीति को अपनी मंजिल बना लिया। धनंजय इरादों के पक्के रहे हैं। फिर वह इरादा सही हो या गलत, उसे पूरा करने के लिए कुछ भी करना पड़े, वे करते हैं।धनंजय सिंह ने एक इंटरव्यू में खुद यह बात कही थी। उन्होंने बताया कि 1991 में यानी 15 साल की उम्र में ही तय कर लिया था कि जिस दिन उम्र 25 साल हो जाएगी। उस दिन रारी से विधानसभा चुनाव लड़ूंगा।
धनंजय सिंह बोले
धनंजय सिंह ने एक इंटरव्यू में खुद यह बात कही थी। उन्होंने बताया कि 1991 में यानी 15 साल की उम्र में ही तय कर लिया था कि जिस दिन उम्र 25 साल हो जाएगी। उस दिन रारी से विधानसभा चुनाव लड़ूंगा।ठीक ऐसा ही हुआ भी। धनंजय ने 27 साल की उम्र में रारी विधानसभा से चुनाव लड़ा। उस वक्त धनंजय लखनऊ जेल में थे और जेल से ही वह नामांकन करने पहुंचे थे।जौनपुर के रहने वाले राजदेव सिंह, कोलकता में एक निजी बैंक में नौकरी करते थे। वह पत्नी लालती देवी और बेटे जितेंद्र सिंह के साथ वहीं रहते थे। साल 1975 का वक्त था। परिवार में दूसरे बेटे का जन्म हुआ और नाम रखा गया धनंजय सिंह।जन्म से करीब 14 साल तक धनंजय कोलकाता में ही रहे। बाद में पिता राजदेव परिवार को लेकर गांव शिफ्ट हो गए। यह साल था 1989-90। कहा जाता है कि कोलकता में एक हत्या केस में धनंजय सिंह का नाम आया। इससे पिता राजदेव घबरा गए। उन्होंने बेटे के साथ पूरे परिवार को गांव पहुंचा दिया।
1991 में घर में आई थी पुलिस
धनंजय का गांव सिकरारा थाने का बनसफा है। ठाकुर परिवार यानी धनंजय के पिता राजदेव की गिनती यहां पढ़े-लिखे और शालीन लोगों में होती थी। अच्छी खेती, बाग बगीचा, आंगन-दालान और कई कमरों का मकान। पहली बार 1991 में इस घर में पुलिस आई, वह भी धनंजय सिंह की तलाश में।
हुआ यूं कि शहर के लाइन बाजार थाने में धनंजय के खिलाफ पहला मुकदमा दर्ज हुआ। उस वक्त धनंजय 11वीं में थे। उम्र 15 साल थी। यह केस जौनपुर के चर्चित टीडी कॉलेज में मारपीट और बलवा से जुड़ा था। इसमें पुलिस ने धनंजय को जब पकड़ा तो उनके पास से कट्टा यानी तमंचा मिला। इस मामले में उनकी गिरफ्तारी भी हुई।
करीब एक साल बाद। यानी जब धनंजय 12वीं में थे, तभी टीडी कॉलेज में एक छात्र की हत्या हो गई। छात्रसंघ की राजनीति में हुई इस हत्या में धनंजय का नाम आया। पुलिस धनंजय की तलाश में लग गई। आखिरकार धनंजय पकड़े गए। उसे हिरासत में रखा। फिर 12वीं के 3 पेपर के एग्जाम धनंजय ने पुलिस निगरानी में दिए। हालांकि, बाद में इस हत्याकांड की FIR में धनंजय का नाम नहीं आया।
धनंजय ने जौनपुर में पढ़ाई पूरी की
धनंजय की मां मजबूरी में बेटों को लेकर कोलकता से गांव तो आ गईं थीं लेकिन, उन्हें यहां अपने बच्चों के भविष्य की और चिंता सताने लगी। उन दिनों गांव में किसी के घर भी पंडित या बाबा आते थे तो मां लालती देवी धनंजय का हाथ जरूर दिखाती थीं। बताते हैं कि ऐसे ही कोई बड़े पंडित आए थे। मां ने धनंजय का हाथ दिखाया। हाथ देखते ही पंडित ने हैरानी जताई।मां से कहा कि बेटे के ग्रह नक्षत्र ठीक नहीं हैं। इसके कम उम्र में अपराध में फंसने की संभावना है। यह सुनकर मां घबरा गई। मां के डर के पीछे की वजह भी थी क्योंकि, बेटा मर्डर में न फंस जाए, इसलिए उन्हें कोलकाता छोड़कर आना पड़ा था। धनंजय के गांव बनसफा के तीनों तरफ 3 इंटर कॉलेज थे। रीठी, ककोहियां और खपरहां में अच्छे स्कूल थे। लेकिन पंडित की भविष्यवाणी के बाद धनंजय को पढ़ाई के लिए जौनपुर भेजने की तैयारी हो गई। ताकि वह अच्छे माहौल में पढ़ाई कर सके।














