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नई शिक्षा नीति विवाद: पहली बार सामने आया पीएम मोदी का बयान, केंद्र-तमिलनाडु के टकराव पर ये बोले प्रधानमंत्री

उमाकांत त्रिपाठी।राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत तीन-भाषा नीति को लेकर केंद्र और तमिलनाडु सरकार के बीच चल रही खींचतान के बीच, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को कहा कि- भारत की भाषाएं हमेशा बिना किसी दुश्मनी के एक-दूसरे को प्रभावित और समृद्ध करती रही हैं.

भारतीय भाषाओं के बीच कभी कोई दुश्मनी नहीं रही है-पीएम
नई दिल्ली में 98वें अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा,कि-भारतीय भाषाओं के बीच कभी कोई दुश्मनी नहीं रही है. भाषाओं ने हमेशा एक-दूसरे को प्रभावित और समृद्ध किया है. अक्सर, जब भाषाओं के आधार पर विभाजन पैदा करने की कोशिश की गई, तो भारत की साझा भाषाई विरासत ने इसका माकूल जवाब दिया.

इसके अलावा, प्रधानमंत्री ने लोगों से ऐसी ‘गलत धारणाओं’ से खुद को दूर रखने और सभी भाषाओं को समृद्ध बनाने के लिए कहा. एजेंसी के मुताबिक, पीएम मोदी ने कहा, “यह हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है कि हम इन गलत धारणाओं से खुद को दूर रखें और सभी भाषाओं को अपनाएं और समृद्ध करें.

जानें-DMK ने क्या कहा?
प्रधानमंत्री मोदी का यह बयान, हालांकि- किसी व्यक्ति विशेष पर टार्गेटेड नहीं था, लेकिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत तीन-भाषा नीति को लेकर एमके स्टालिन के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार और केंद्र के बीच चल रही राजनीतिक खींचतान के बैकग्राउंड में आया है.इससे पहले दिन में, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने दक्षिणी राज्यों से एनईपी पर राजनीतिक मतभेदों को अलग रखने को कहा,कि- लेकिन द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने जोर देकर कहा कि- वह अपनी दो-भाषा नीति से पीछे नहीं हटेगी.

केंद्रीय मंत्री ने स्टालिन पर लगाया आरोप
धर्मेंद्र प्रधान ने स्टालिन पर ‘राजनीतिक आख्यानों को बनाए रखने के लिए प्रगतिशील सुधारों को धमकियों में बदलने का आरोप लगाया. इस बीच, तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी ने दावा किया कि राज्य को केंद्रीय निधियों के अपने हिस्से के बदले में NEP और हिंदी को शामिल करने वाली 3-भाषा नीति को लागू करने के लिए कहा जा रहा है.

स्टालिन द्वारा पीएम मोदी को लिखे गए एक पत्र के जवाब में मंत्री ने लिखा,कि-राजनीतिक कारणों से NEP 2020 का लगातार विरोध तमिलनाडु के छात्रों, शिक्षकों और शैक्षणिक संस्थानों को इस नीति द्वारा प्रदान किए जाने वाले अवसरों और संसाधनों से वंचित करता है. नीति को लचीला बनाने के लिए डिजाइन किया गया है, जिससे राज्यों को अपनी अनूठी शैक्षिक जरूरतों के मुताबिक इसके इम्प्लीमेंटेशन को अनुकूलित करने की अनुमति मिलती है.

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