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कच्चाथीवू सियासत तेज, पीएम मोदी के बाद सामने आया विदेश मंत्री का बयान- जयशंकर ने कांग्रेस को घेरा

उमाकांत त्रिपाठी।विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कच्चाथीवू मसले पर प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि ये ऐसा मुद्दा नहीं है, जो आज अचानक उठा है। ये वो मसला है, जो संसद और तमिलनाडु में लगातार उठता रहा है, इस पर बहस हुई। मेरे रिकॉर्ड बताते हैं कि इस मसले पर मैंने मौजूदा मुख्यमंत्री को 21 बार जवाब दिया है।उन्होंने कहा कि पिछले 20 साल में 6184 भारतीय मछुआरों को श्रीलंका ने पकड़ा। भारत की मछली पकड़ने वाली 1175 नावें सीज की गईं। कई पार्टियों ने लगातार कच्चाथीवू और मछुआरों का मसला संसद में उठाया है। कांग्रेस और डीएमके ऐसा दिखा रही हैं कि उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है और यह अभी अभी का मसला है।उन्होंने कहा कि जनता को ये जानने का अधिकार है कि 1974 में कच्चाथीवू को कैसे दे दिया गया। यह मसला वो 2 पार्टियां उठाती हैं, जिन्होंने इसे अंजाम दिया है। जब भी कोई गिरफ्तारी होती है, जो ये लोग मुद्दा उठाते हैं। चेन्नई में बैठकर बयान देना आसान है, लेकिन उन मछुआरों को कैसे छुड़ाया जाता है, ये हम जानते हैं।

कच्चाथीवू पर जयशंकर की प्रेस कॉन्फ्रेंस की अहम बातें

1. 1974 के समझौते की तीन कंडीशन थीं
जयशंकर ने कहा कि 1974 में इंडिया और श्रीलंका ने एक समझौता किया, जिसके जरिए दोनों देशों के बीच समुद्री सीमा का निर्धारण हुआ। इस सीमा को तय करते वक्त कच्चाथीवू को श्रीलंका में दे दिया गया। इस समझौते की 3 और कंडीशन थीं।पहली- दोनों देशों का अपनी जल सीमा पर पूरा अधिकार और संप्रभुता होगी, दूसरी- कच्चाथीवू का इस्तेमाल भारतीय मछुआरे भी कर सकेंगे और इसके लिए किसी ट्रैवल डॉक्यूमेंट की आवश्यकता नहीं होगी। तीसरी- भारत और श्रीलंका की नौकाएं एक-दूसरे की सीमा में वो यात्राएं कर सकेंगी जो वो परंपरागत रूप से करती आ रही हैं।

यह समझौता संसद में रखा गया। तब के विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह जी ने 23 जुलाई 1974 को संसद को भरोसा दिलाया था। मैं उन्हीं का स्टेटमेंट पढ़ रहा हूं, जो कहता है- मुझे विश्वास है कि दोनों देशों के बीच सीमाओं का निर्धारण बराबरी से हुआ है, ये न्यायसंगत है और सही है।

स्वर्ण सिंह जी ने आगे कहा था कि मैं सभी सदस्यों को याद दिलाना चाहता हूं कि इस समझौते को करते वक्त दोनों देशों को भविष्य में मछली पकड़ने, धार्मिक कार्य करने और नौकाएं चलाने का अधिकार रहेगा। 2 साल के भीतर ही इंडिया और श्रीलंका के बीच एक और समझौता हुआ था।

 

2. कांग्रेस और DMK कच्चाथीवू पर अपनी जिम्मेदारी को नकार रहीं
एस जयशंकर ने कहा, कच्चाथीवू और मछुआरों के मसले पर अब कांग्रेस और डीएमके इस तरह का व्यवहार कर रही हैं कि उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है और आज की केंद्र सरकार इस मसले को हल करे। जैसे इसका कोई इतिहास नहीं है, जैसे ये अभी हुआ है। कांग्रेस-डीएमके वे लोग हैं, जो इस मसले को उठा रहे हैं।आज की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस का मकसद बताता हूं। हम मानते हैं कि जनता को ये जानने का अधिकार है कि 1974 में कच्चाथीवू को कैसे दे दिया गया। समझौता कैसे हुआ। मछुआरों के मसले को किस तरह से देखा गया। फिशिंग का मसला 1976 में हुए समझौते से शुरू हुआ।

 

3. हम नहीं जानते इसे जनता से किसने छिपाया
जयशंकर ने कहा, हम आज 2 एग्रीमेंट की बात कर रहे हैं। हमने 2 दस्तावेज देखे। RTI के जरिए ये दस्तावेज हमें मिले। विदेश मंत्रालय की 1968 की एक कमेटी की रिपोर्ट है। दूसरा दस्तावेज तब के विदेश सचिवों और तब के तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के बीच हुई बातचीत का रिकॉर्ड है, जून 19, 1974 का है।कच्चाथीवू का मुद्दा लंबे समय तक जनता से छिपाया गया। कौन जिम्मेदार है, कौन इसमें शामिल है, किसने इसे छिपाया। हम जानते हैं। हमें यह लगता है कि जनता को यह जानने का अधिकार कि किसने यह किया है। आज भी मछुआरों को पकड़ा जा रहा है, नावों को पकड़ा जा रहा है। आज भी यह मसला संसद में उठता है।यह मसला वो 2 पार्टियां उठाती हैं, जिन्होंने इसे अंजाम दिया है। जब भी कोई गिरफ्तारी होती है, जो ये लोग मुद्दा उठाते हैं। आपको क्या लगता है, इन लोगों को कैसे छुड़ाया जाता है। चेन्नई में बैठकर बयान देना आसान है, लेकिन जो लोग इस पर काम करते हैं, वो हम लोग हैं।

 

285 एकड़ में फैला है कच्चाथीवू
भारत के तमिलनाडु और श्रीलंका के बीच काफी बड़ा समुद्री क्षेत्र है। इस समुद्री क्षेत्र को पाक जलडमरूमध्य कहा जाता है। यहां कई सारे द्वीप हैं, जिसमें से एक द्वीप का नाम कच्चाथीवू है।श्रीलंका के विदेश मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक कच्चाथीवू 285 एकड़ में फैला एक द्वीप है। ये द्वीप बंगाल की खाड़ी और अरब सागर को जोड़ता है।

 

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