उमाकांत त्रिपाठी।Sukhbir Singh Badal PM Modi Meeting ने पंजाब की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। शुक्रवार सुबह शिरोमणि अकाली दल (SAD) के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने संसद भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से करीब 40 से 45 मिनट तक मुलाकात की। इस बैठक से पहले उन्होंने हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से भी मुलाकात की थी। लगातार हुई इन अहम बैठकों के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) और शिरोमणि अकाली दल एक बार फिर गठबंधन कर सकते हैं।
पंजाब विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीने शेष हैं। ऐसे में दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व की यह मुलाकात केवल शिष्टाचार भेंट नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे भविष्य की राजनीतिक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
PM मोदी और सुखबीर बादल की मुलाकात के क्या हैं राजनीतिक मायने?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुखबीर सिंह बादल की करीब 45 मिनट तक चली बैठक ने पंजाब की राजनीति का तापमान बढ़ा दिया है। हालांकि बैठक के बाद किसी भी पक्ष ने आधिकारिक रूप से गठबंधन को लेकर कोई बयान नहीं दिया, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए दोनों दल अपने पुराने सहयोग को फिर से जीवित करने की संभावनाओं पर विचार कर सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, भाजपा पंजाब में अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है, जबकि अकाली दल पिछले चुनाव में कमजोर प्रदर्शन के बाद अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस हासिल करना चाहता है। ऐसे में दोनों दलों के लिए गठबंधन फायदे का सौदा साबित हो सकता है।
अरविंद केजरीवाल ने कसा तंज, सुखबीर बादल ने दिया जवाब
प्रधानमंत्री मोदी और सुखबीर बादल की मुलाकात पर आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया के जरिए तंज कसते हुए लिखा—
“ना-ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे… तो क्या चंदा चोर पार्टी और बेअदबी पार्टी का गठबंधन हो रहा है?”
केजरीवाल के इस बयान का जवाब देते हुए सुखबीर सिंह बादल ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले AAP ने पंजाब में 20,000 करोड़ रुपये के अवैध खनन को बंद करने का वादा किया था, लेकिन अब राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के आदेश ने साबित कर दिया कि सरकार अपने वादों पर खरी नहीं उतर सकी।
सुखबीर बादल ने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी की गारंटियां जनता के भरोसे पर खरी नहीं उतरीं।
कांग्रेस ने भी साधा निशाना
पंजाब विधानसभा में विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने भी इस मुलाकात पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्हें पहले से ही अंदाजा था कि भाजपा और अकाली दल फिर साथ आ सकते हैं।
उन्होंने कहा कि दोनों दलों का गठबंधन होने से कोई बड़ा राजनीतिक बदलाव नहीं होगा। बाजवा के मुताबिक, दोनों दल पहले भी कमजोर हो चुके हैं और गठबंधन के बाद भी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आएगा।
25 साल तक चला था BJP और अकाली दल का गठबंधन
पंजाब की राजनीति में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल का गठबंधन सबसे सफल राजनीतिक साझेदारियों में गिना जाता है। दोनों दलों ने वर्ष 1996 में गठबंधन किया था और करीब 25 वर्षों तक साथ रहे।
इस गठबंधन ने:
- 1997 में पहली बार सरकार बनाई।
- 2007 में दोबारा सत्ता हासिल की।
- 2012 में लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर इतिहास रच दिया।
पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल इस गठबंधन को “नौह-मांस का रिश्ता” बताते थे, जिसका अर्थ होता है ऐसा संबंध जिसे अलग करना आसान नहीं होता।
गठबंधन की सफलता के पीछे रहे तीन बड़े कारण
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार भाजपा-अकाली गठबंधन की सफलता के पीछे कई अहम कारण थे।
1. अलग-अलग वोट बैंक
अकाली दल की ग्रामीण और पंथक क्षेत्रों में मजबूत पकड़ थी, जबकि भाजपा शहरी और हिंदू मतदाताओं के बीच प्रभावशाली मानी जाती थी। दोनों दलों के वोट बैंक एक-दूसरे के पूरक थे।
2. मजबूत सीट शेयरिंग फॉर्मूला
गठबंधन के दौरान अकाली दल लगभग 94 सीटों और भाजपा 23 सीटों पर चुनाव लड़ती थी। इससे दोनों दल अपने मजबूत क्षेत्रों पर फोकस कर पाते थे और वोटों का बंटवारा नहीं होता था।
3. कार्यकर्ताओं का तालमेल
दोनों दलों के कार्यकर्ता चुनाव में एक-दूसरे का खुलकर समर्थन करते थे। इसी वजह से 2012 में गठबंधन ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाई, जो पंजाब के इतिहास में पहली बार हुआ था।
2020 में टूटा गठबंधन, 2022 में दोनों दलों को हुआ नुकसान
कृषि कानूनों के मुद्दे पर वर्ष 2020 में भाजपा और अकाली दल का गठबंधन टूट गया। इसके बाद 2022 विधानसभा चुनाव में दोनों दल अलग-अलग मैदान में उतरे।
परिणामस्वरूप:
- भाजपा और अकाली दल दोनों का वोट बैंक बंट गया।
- दोनों पार्टियां सिंगल डिजिट सीटों तक सिमट गईं।
- आम आदमी पार्टी को इसका सबसे बड़ा फायदा मिला और उसने ऐतिहासिक बहुमत के साथ सरकार बनाई।
अगर फिर गठबंधन हुआ तो 2027 में क्या बदलेगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा और अकाली दल फिर से साथ आते हैं, तो पंजाब का चुनावी मुकाबला पूरी तरह बदल सकता है।
संभावित असर:
- भाजपा और अकाली दल का पारंपरिक वोट बैंक फिर एकजुट हो सकता है।
- आम आदमी पार्टी के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।
- कांग्रेस के लिए भी चुनावी समीकरण और कठिन हो सकते हैं।
- मुकाबला त्रिकोणीय होने के बजाय सीधा और अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकता है।
हालांकि गठबंधन को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए फिलहाल सभी संभावनाएं राजनीतिक अटकलों के दायरे में हैं।














