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Microplastics vs Fertility: इस वजह से आपके घर में पैदा नहीं हो रहे बच्चे, पुरुषों और महिलाओं में लगातार बढ़ रहा बांझपन

उमाकांत त्रिपाठी।Microplastics vs Fertility: इस वजह से आपके घर में पैदा नहीं हो रहे बच्चे, पुरुषों और महिलाओं में लगातार बढ़ रहा बांझपन

आज के दौर में प्लास्टिक हमारी जिंदगी का ऐसा हिस्सा बन चुका है जिससे पूरी तरह बच पाना लगभग नामुमकिन है। Microplastics and Fertility को लेकर हाल ही में सामने आई रिसर्च ने दुनियाभर के वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। पीने के पानी, पैक्ड फूड, घर की धूल और यहां तक कि हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक अब इंसानी शरीर तक पहुंच चुके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ये सूक्ष्म कण पुरुषों और महिलाओं दोनों की प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।

पहले माइक्रोप्लास्टिक को केवल पर्यावरणीय समस्या माना जाता था, लेकिन अब इसके मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर लगातार शोध हो रहे हैं। कई अध्ययनों में यह पाया गया है कि ये कण शरीर के महत्वपूर्ण अंगों तक पहुंच सकते हैं, जिससे स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।

क्या होते हैं माइक्रोप्लास्टिक?

माइक्रोप्लास्टिक बेहद छोटे प्लास्टिक कण होते हैं जिनका आकार 5 मिलीमीटर से भी कम होता है। बड़े प्लास्टिक उत्पाद समय के साथ टूटकर इन सूक्ष्म कणों में बदल जाते हैं। ये पानी, भोजन और हवा के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।

हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों ने माइक्रोप्लास्टिक को मानव रक्त, फेफड़ों, प्लेसेंटा, स्पर्म और महिलाओं के ओवरी फॉलिकल फ्लूइड में भी खोजा है। यही कारण है कि इनके स्वास्थ्य और विशेष रूप से प्रजनन क्षमता पर प्रभाव को लेकर चिंता बढ़ रही है।

पुरुषों और महिलाओं की फर्टिलिटी पर कैसे पड़ता है असर?

साल 2024 में यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मैक्सिको के शोधकर्ताओं द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन में मानव टेस्टिकुलर टिश्यू में माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए। वहीं अन्य अध्ययनों में महिलाओं के फॉलिक्युलर फ्लूइड में भी इनकी मौजूदगी दर्ज की गई।

हालांकि वैज्ञानिक अभी यह नहीं कह रहे कि माइक्रोप्लास्टिक सीधे तौर पर बांझपन का कारण बनते हैं, लेकिन इसके संभावित प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

विशेषज्ञों के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ा सकते हैं। इससे कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाले रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज की मात्रा बढ़ जाती है। यह स्थिति प्रजनन कोशिकाओं को प्रभावित कर सकती है।

पुरुषों में इसके कारण:

  • स्पर्म की संख्या कम हो सकती है।
  • स्पर्म की गतिशीलता प्रभावित हो सकती है।
  • डीएनए डैमेज का खतरा बढ़ सकता है।
  • टेस्टोस्टेरोन हार्मोन के संतुलन में गड़बड़ी हो सकती है।

वहीं महिलाओं में:

  • ओवरी की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।
  • अंडों की गुणवत्ता में गिरावट आ सकती है।
  • फर्टिलाइजेशन प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।
  • हार्मोनल असंतुलन बढ़ सकता है।

हार्मोन सिस्टम पर भी पड़ सकता है प्रभाव

कोलकाता स्थित नोवा आईवीएफ की फर्टिलिटी विशेषज्ञ डॉ. अनिंदिता सिंह के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक शरीर के हार्मोन सिस्टम में हस्तक्षेप कर सकते हैं। ये एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरोन जैसे महत्वपूर्ण हार्मोन के स्तर को प्रभावित कर सकते हैं।

इसके अलावा माइक्रोप्लास्टिक माइटोकॉन्ड्रिया की कार्यप्रणाली को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया कोशिकाओं को ऊर्जा प्रदान करते हैं और प्रजनन प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि इनकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है तो फर्टिलिटी पर भी असर पड़ सकता है।

क्या माइक्रोप्लास्टिक से पूरी तरह बचना संभव है?

विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान समय में माइक्रोप्लास्टिक से पूरी तरह बच पाना मुश्किल है, लेकिन इसके संपर्क को कम किया जा सकता है।

इसके लिए:

  • प्लास्टिक की बोतलों की जगह स्टील या कांच के बर्तनों का उपयोग करें।
  • गर्म भोजन को प्लास्टिक कंटेनर में रखने से बचें।
  • सिंगल यूज प्लास्टिक का उपयोग कम करें।
  • ताजे और बिना पैकेजिंग वाले खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता दें।
  • घर में धूल की नियमित सफाई करें।

अभी और रिसर्च की जरूरत

वैज्ञानिकों का मानना है कि माइक्रोप्लास्टिक और बांझपन के बीच संबंध को लेकर अभी और व्यापक शोध की जरूरत है। हालांकि शुरुआती अध्ययन चिंता बढ़ाने वाले हैं, लेकिन अभी तक ऐसा कोई निर्णायक प्रमाण नहीं मिला है जो यह साबित कर सके कि केवल माइक्रोप्लास्टिक ही बांझपन का मुख्य कारण हैं।फिर भी विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि बढ़ते माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को नजरअंदाज करना भविष्य में मानव स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।

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