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सूतिया समुदाय को पीएम मोदी की सौगात, मिला ₹77 करोड़ रुपये के साथ आरक्षण का तोहफ़ा, असम सरकार का फैसला

उमाकांत त्रिपाठी।दशकों से उपेक्षित असम के सूतिया समुदाय के लोगों के लिए राज्य सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछड़ों को मुख्यधारा से जोड़ने के सपने के तहत असम सरकार ने सूतिया समुदाय के छात्रों को उच्च शिक्षा में आरक्षण की घोषणा के साथ ही अन्य उपहार भी दिए हैं। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने ये ऐतिहासिक घोषणा करते हुए कहा कि राज्य के प्राचीन एवं गौरवशाली सूतिया समुदाय के विद्यार्थियों को अब उच्च शिक्षा के विभिन्न संस्थानों में विशेष आरक्षण मिलेगा।

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा कि- दशकों तक सूतिया समुदाय की आकांक्षाओं को अनदेखा किया गया, लेकिन हमारी सरकार में इन्हें मुख्यधारा में सम्मानित स्थान मिल रहा है। वीरांगना सती साधनी की प्रतिमा से लेकर ₹77 करोड़ की आर्थिक सहायता, राज्य विश्वविद्यालय की स्थापना और अब उच्च शिक्षा में सीटों का आरक्षण, यही है नया असम, जहां विरासत ही विकास की प्रेरणा बन रही है।राज्य सरकार के नए प्रावधान के तहत राज्य विश्वविद्यालयों में 18 सीटें, पॉलिटेक्निक संस्थानों में 9 सीटें व इंजीनियरिंग कॉलेजों में 32 सीटें विशेष रूप से सूतिया समुदाय के विद्यार्थियों के लिए आरक्षित रहेंगी। इस कदम से इस समुदाय के युवाओं के लिए उच्च शिक्षा पहले से अधिक सुगम हो जायेगी और तकनीकी, इंजीनियरिंग तथा शोध के क्षेत्र में उनकी भागीदारी बढ़ेगी।

जानिए- क्या है सूतिया समुदाय का इतिहास?
सूतिया समुदाय असम का एक प्राचीन स्वदेशी जातीय समूह है, जो मुख्यतः ऊपरी असम के तिनसुकिया, डिब्रूगढ़, धेमाजी और लखीमपुर जिलों में निवास करता है। 12वीं से 16वीं शताब्दी के दौरान इस समुदाय ने ब्रह्मपुत्र घाटी में सूतिया साम्राज्य की स्थापना की थी। यह साम्राज्य अपनी उन्नत कृषि व्यवस्था, सांस्कृतिक समृद्धि और असमिया समाज में योगदान के लिए जाना जाता था।

इतिहासकारों के अनुसार, सूतिया साम्राज्य की स्थापना के बाद ब्रह्मपुत्र घाटी में व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को नई ऊंचाइयां मिलीं। लेकिन 1523-24 में अहोम साम्राज्य के अधीन आने के बाद इस समुदाय को बड़े पैमाने पर विस्थापन का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद, सूतिया समाज ने अपनी पहचान, भाषा और परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखा। मूल रूप से तिब्बती-बर्मी भाषा बोलने वाले सूतिया समुदाय ने समय के साथ असमिया भाषा और हिंदू धर्म को अपनाया। देवी काली के विभिन्न रूपों की पूजा और लोकगीत, नृत्य एवं पारंपरिक त्योहार इनके सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं।

आज सूतिया समुदाय को असम में अन्य पिछड़ा वर्ग का दर्जा प्राप्त है। अधिकांश लोग कृषि, लघु व्यवसाय, सरकारी सेवाओं और छोटे उद्यमों में कार्यरत हैं, लेकिन उच्च शिक्षा और पेशेवर प्रशिक्षण के क्षेत्र में अवसर सीमित रहे हैं।राज्य सरकार द्वारा ₹77 करोड़ की आर्थिक सहायता, राज्य विश्वविद्यालय की स्थापना, वीरांगना सती साधनी की प्रतिमा और अब उच्च शिक्षा में आरक्षण, इस समुदाय के सामाजिक-आर्थिक उत्थान और शैक्षणिक सशक्तिकरण की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल सूतिया युवाओं को बेहतर शिक्षा मिलेगी, बल्कि राज्य की समग्र प्रगति में उनकी भागीदारी भी बढ़ेगी।

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