उमाकांत त्रिपाठी. संसद में महिला आरक्षण बिल गिरने के बाद देश की राजनीति में घमासान मच गया है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के रूप में पेश किया गया यह महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पास नहीं हो सका। बिल को पारित कराने के लिए जरूरी आंकड़ा नहीं जुट पाया और यह 54 वोटों से पीछे रह गया। कुल 352 सांसदों की मौजूदगी में 230 वोट इसके खिलाफ पड़े, जिससे यह बिल गिर गया।
इस घटनाक्रम के बाद सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने विपक्ष पर तीखा हमला बोलते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने लिखा, “देश की आधी आबादी, 70 करोड़ महिलाओं को धोखा देने और उनका विश्वास खोने के बाद कोई कैसे जश्न मना सकता है?”
अमित शाह ने विपक्ष के रवैये को महिलाओं का अपमान बताते हुए कहा कि यह उन महिलाओं के संघर्ष का मजाक है, जो वर्षों से अपने अधिकारों का इंतजार कर रही हैं। उन्होंने कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह पहली बार नहीं है जब महिलाओं के साथ विश्वासघात हुआ है।
इस मुद्दे पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष Nitin Navin ने भी कांग्रेस और उसके गठबंधन सहयोगियों पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि यह दिन इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा जा सकता था, लेकिन विपक्ष के “घोर विश्वासघात” ने इसे खराब कर दिया। उनके मुताबिक, कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाले गठबंधन ने देश की आधी आबादी के अधिकारों को नजरअंदाज किया है।
नवीन ने समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और द्रविड़ मुनेत्र कषगम जैसे दलों का नाम लेते हुए आरोप लगाया कि इन पार्टियों ने महिलाओं को उनके उचित अधिकारों से वंचित किया। उन्होंने यह भी कहा कि यह विधेयक महिलाओं की राजनीति में भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम हो सकता था, लेकिन विपक्ष ने इसे रोक दिया।
वहीं, केंद्रीय मंत्री Shivraj Singh Chouhan ने इस पूरे घटनाक्रम को लोकतंत्र और देश की महिलाओं के लिए “काला दिन” करार दिया। उन्होंने विपक्षी गठबंधन INDIA पर हमला करते हुए कहा कि यह फैसला देश के लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
केंद्रीय मंत्री Piyush Goyal ने भी इस मुद्दे पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक विधेयक का खारिज होना नहीं है, बल्कि महिलाओं के अधिकारों के साथ “विश्वासघात” है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि इस फैसले की राजनीतिक कीमत विपक्ष को आने वाले चुनावों में चुकानी पड़ेगी।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या महिला आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक सहमति से हल हो पाएगा, या यह आगे भी सियासी टकराव का कारण बना रहेगा। एक तरफ भाजपा इसे महिला सशक्तिकरण का बड़ा कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे सरकार की विफलता के रूप में पेश कर रहा है।
फिलहाल, महिला आरक्षण बिल का गिरना न सिर्फ संसद के भीतर बल्कि देशभर में एक बड़ी बहस का मुद्दा बन चुका है, और आने वाले दिनों में यह राजनीतिक एजेंडा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।














