उमाकांत त्रिपाठी।राजधानी दिल्ली में मंगलवार शाम एक के बाद एक हाई-प्रोफाइल मीटिंग ने सियासी गलियारों में हलचल बढ़ा दी. पहले गृह मंत्री अमित शाह और कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के बीच महत्वपूर्ण मुलाकात हुई, फिर शाह भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के आवास पहुंचे. वहां से लौटने के बाद शाह और नड्डा रात तक फिर से शाह के निवास पर बैठे. लगातार हो रही इन मुलाकातों के पीछे का मकसद क्या है? यही सवाल अब राजनीतिक गलियारों में तेजी से घूम रहा है.
जानिए- मीटिंग की टाइमलाइन क्या कहती है?
बुधवार शाम 5 बजे सबसे पहले अमित शाह और कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल की मुलाकात हुई. इसके कुछ ही समय बाद शाह और नड्डा, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के आवास पर पहुंचे. इन बैठकों की खास बात ये रही कि इनकी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई, और न ही मीडिया को कोई जानकारी दी गई. लेकिन देर शाम शाह और नड्डा की एक बार फिर शाह के सरकारी आवास पर लंबी बैठक ने यह संकेत जरूर दे दिया कि कोई बड़ा राजनीतिक या संवैधानिक निर्णय जल्द सामने आ सकता है.
जानिए- क्या है असली मुद्दा?
सूत्रों की मानें तो सरकार और बीजेपी नेतृत्व अब सुप्रीम कोर्ट के एक सिटिंग जज जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने पर रणनीति बना रही है. यह वही जस्टिस वर्मा हैं, जिनके फैसलों और टिप्पणियों को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं. उपराष्ट्रपति धनखड़ भी इन्हें लेकर काफी मुखर रहे हैं. वह पहले भी जस्टिस वर्मा जैसे कुछ न्यायाधीशों की कार्यशैली पर सार्वजनिक मंचों से गंभीर सवाल उठा चुके हैं. ऐसे में उनके आवास पर शाह और नड्डा की मौजूदगी, एक संवैधानिक पहल की तैयारी की ओर इशारा कर रही है.
जानिए- क्या है धनखड़ की भूमिका?
धनखड़ न केवल विधायी प्रक्रिया में सक्रिय रहते हैं, बल्कि न्यायपालिका और विधायिका के टकराव पर भी खुलकर बोलते रहे हैं. पिछले कुछ महीनों में उन्होंने जजों की जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर कई बार सार्वजनिक मंचों से अपनी राय रखी है. यह भी माना जा रहा है कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई की जा सकती है.
जानें- नड्डा की मौजूदगी क्यों है अहम?
राजनीति के जानकारों के मुताबिक- जेपी नड्डा का शाह के साथ बार-बार बैठना और फिर उपराष्ट्रपति के साथ जाना दिखाता है कि यह मसला केवल संवैधानिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति से भी जुड़ा हुआ है. भाजपा यह सुनिश्चित करना चाहती है कि अगर महाभियोग की कार्रवाई होती है, तो उसमें राजनीतिक रूप से नुकसान न हो और विपक्ष को एकजुट होने का मौका न मिले.















