उमाकांत त्रिपाठी।2024 लोकसभा चुनाव ने एनडीए को बहुमत दिया है लेकिन भाजपा को नहीं. विपक्ष इसे नरेंद्र मोदी की हार कह रहा है. नरेंद्र मोदी तीसरी बार बतौर एनडीए के नेता शपथ लेने की तैयारी कर रहे हैं. इस बार हालात पिछले दो बार से काफी अलग है. मंत्रालयों में केवल सांकेतिक हिस्सेदारी नहीं चलेगी. भाजपा सहयोगियों को कौन सा मंत्रालय दे सकती है और कौन सा नहीं? आइये समझें.
मोदी 3.0 में सहयोगी दलों की भूमिका महत्वपूर्ण रहने वाली है. खासकर टीडीपी, जेडीयू, शिवसेना, लोक जनशक्ति पार्टी राम विलास के सहयोग के बिना भाजपा का सरकार बनाना मुश्किल होगा. इन चार पार्टियों को ही मिला कर 40 सांसद हैं. भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव परिणाम में बहुमत से 32 पायदान दूर रह गई है.
टीडीपी और जेडीयू अपने लिए मनपसंद मंत्रालय चाहती हैं. हर चार सांसद पर एक मंत्री की मांग है.इस लिहाज से टीडीपी (16) चार, जेडीयू (12) 3, शिवसेना (7) और चिराग पासवान (5) को दो-दो मंत्रालयों की उम्मीद है.टीडीपी स्पीकर पद भी चाहती है, हालांकि बीजेपी इसके लिए तैयार नहीं है.ज्यादा जोर देने पर डिप्टी स्पीकर का पद टीडीपी को मिल सकता है.जेडीयू के पास पहले से ही राज्य सभा डिप्टी चेयरमैन का पद है.
अभी तक मोदी के दो कार्यकाल में सहयोगी दलों को सांकेतिक प्रतिनिधित्व मिलता रहा है. लेकिन इस बार मामला अलग है. भाजपा के पास अपने बलबूते संख्या नहीं है. पिछली लोकसभा में सहयोगियों को उनकी संख्या के अनुपात में मंत्री पद देने के बजाए केवल सांकेतिक नुमाइंदगी दी गई. जेडीयू ने 2019 में संख्या के हिसाब से नुमाइंदगी की मांग की थी और ऐसा न होने पर सरकार में शामिल नहीं हुई थी.
BJP किन मंत्रालयों को नहीं देना चाहेगी?
बदली परिस्थितियों में बीजेपी को संख्या के हिसाब से ही मंत्री बनाने होंगे.इसका मतलब होगा कि मंत्रिपरिषद में बीजेपी के मंत्रियों की संख्या घटेगी और सहयोगियों की संख्या बढेगी. लेकिन कुछ शर्तों पर बीजेपी शायद ही समझौता करे. सीसीएस के चार मंत्रालयों में सहयोगियों को शायद ही जगह मिले. ये चार मंत्रालय हैं – रक्षा, वित्त, गृह और विदेश.इसके अलावा इंफ्रास्ट्रक्चर, गरीब कल्याण, युवा से जुड़े और कृषि मंत्रालयों को भी बीजेपी अपने पास ही रखना चाहेगी.यह नरेंद्र मोदी की बताई गईं चार जातियों – गरीब, महिला, युवा और किसान के लिए योजनाओं को लागू करने के लिए काफी अहम हैं.
रेलवे, सड़क परिवहन आदि में सरकार का बड़े सुधारों का दावा है और बीजेपी इन्हें सहयोगियों को देकर सुधार की रफ्तार धीमी नहीं करना चाहेगी. रेलवे जिस किसी भी सरकार में सहयोगियों के पास रहा, तब लोकलुभावन नीतियों की घोषणाएं हुईं, सरकार का दावा रहा है कि बड़ी मुश्किल से उसे पटरी पर लाया जा रहा है.
NDA की पिछली सरकारों में सहयोगियों की अहमियत
अगर मोदी एक और मोदी दो कार्यकाल देखें तो सहयोगियों को सांकेतिक प्रतिनिधित्व में नागरिक उड्डयन, भारी उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, स्टील और खाद्य, जन वितरण और उपभोक्ता मामले जैसे मंत्रालय दिए गए.खाद्य, जन वितरण एवं उपभोक्ता मामले 2014 में राम विलास पासवान के पास था.
नागरिक उड्डयन टीडीपी के पास रहा.भारी उद्योग एवं पब्लिक एंटरप्राइज शिवसेना के पास रहा, खाद्य प्रसंस्करण अकाली दल और बाद में पशुपति पारस के पास रहा और स्टील मंत्रालय जेडीयू के पास रहा.
वाजपेयी सरकार में उद्योग, पेट्रोलियम, रसायन एवं उर्वरक, कानून एवं विधि, स्वास्थ्य, सड़क परिवहन, वन एवं पर्यावरण, स्टील एंड माइन्स, रेलवे, वाणिज्य और यहां तक कि रक्षा मंत्रालय भी सहयोगियों के पास रहा था.
BJP सहयोगियों को कौन सा मंत्रालय दे सकती है?
बीजेपी को इस बार सहयोगियों के आगे कुछ हद तक झुकना होगा.पंचायती राज्य और ग्रामीण विकास जैसे मंत्रालय जेडीयू को दिए जा सकते हैं.नागरिक उड्डयन, स्टील जैसे मंत्रालय टीडीपी को मिल सकते हैं.
वहीं,भारी उद्योग एकनाथ शिंदे की शिवसेना को मिल सकता है.महत्वपूर्ण मंत्रालयों जैसे वित्त, रक्षा में सहयोगियों को राज्य मंत्री पद दिया जा सकता है.पर्यटन, एमएसएमई, स्किल डेवलपमेंट, साइंस टेक्नॉलॉजी एंड अर्थ साइंसेज, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता जैसे मंत्रालय सहयोगियों को देने पर बीजेपी को समस्या नहीं होनी चाहिए.हालांकि, टीडीपी MEITY जैसा मंत्रालय भी मांग सकती है.














