खबर इंडिया की।मद्रास हाईकोर्ट ने तलाक से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि पत्नी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अपने पति के पीछे उसी तरह चलती रहे, जैसे Vodafone के मशहूर विज्ञापन में Pug Dog चलता था। अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर पति नौकरी या किसी अन्य कारण से किसी दूसरे शहर में जाता है तो पत्नी का हर बार उसके साथ जाना कानूनी या वैवाहिक दायित्व नहीं माना जा सकता।
यह मामला करीब 16 साल से अलग रह रहे एक दंपती से जुड़ा है। दोनों की शादी सितंबर 1992 में हुई थी और उनके चार बच्चे हैं। पति की उम्र फिलहाल 67 वर्ष है। लंबे समय से अलग रहने और रिश्ते में पैदा हुई गहरी कड़वाहट को देखते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने आखिरकार दोनों के बीच तलाक को मंजूरी दे दी।
हालांकि, अदालत ने पति को पत्नी के लिए ₹7 लाख की गुजारा भत्ता राशि देने का भी आदेश दिया। इस तरह हाईकोर्ट ने एक तरफ लंबे समय से टूट चुके वैवाहिक रिश्ते को खत्म करने की अनुमति दी, वहीं पत्नी के आर्थिक हितों का भी ध्यान रखा।
Family Court ने पति की तलाक याचिका क्यों खारिज की थी?
पति ने साल 2014 में शिवगंगा की फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दाखिल की थी। उसका कहना था कि वह नौकरी के सिलसिले में तमिलनाडु के शिवगंगा से मुंबई चला गया था, लेकिन उसकी पत्नी उसके साथ मुंबई नहीं गई।
पति ने पत्नी पर किसी दूसरे व्यक्ति के साथ अवैध संबंध होने का आरोप भी लगाया था। हालांकि, सितंबर 2021 में फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी।
फैमिली कोर्ट का तर्क था कि पति खुद नौकरी के लिए मुंबई गया था और पत्नी को अपने साथ लेकर नहीं गया। ऐसे में वह अपनी ही गलती का फायदा उठाकर तलाक की मांग नहीं कर सकता। कोर्ट ने इस आधार पर पति की याचिका को स्वीकार नहीं किया।
इसके बाद पति ने फैमिली कोर्ट के इस फैसले को मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने कहा- पत्नी का हर जगह पति के साथ जाना जरूरी नहीं
मामले की सुनवाई जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस एमडी सुमति की बेंच ने की। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया जिसमें पति के मुंबई चले जाने और पत्नी के साथ नहीं जाने को तलाक के लिए पति की गलती माना गया था।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पत्नी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अपने पति के पीछे Vodafone के Pug Dog की तरह चलती रहे। पति अगर नौकरी या किसी अन्य वजह से एक शहर से दूसरे शहर जाता है तो पत्नी का हर बार उसके साथ जाना अनिवार्य नहीं है।
इस टिप्पणी के जरिए अदालत ने यह स्पष्ट किया कि वैवाहिक रिश्ते में पति और पत्नी दोनों की अपनी स्वतंत्र परिस्थितियां और निर्णय हो सकते हैं। केवल इस वजह से कि पत्नी पति के साथ दूसरे शहर में नहीं गई, उसे वैवाहिक दायित्वों की अनदेखी करने वाला नहीं माना जा सकता।
16 साल से अलग रह रहा था कपल, समझौते की कोशिश भी नाकाम
मामले में एक अहम तथ्य यह था कि पति-पत्नी करीब 16 वर्षों से अलग-अलग रह रहे थे। इतने लंबे समय तक अलग रहने के बावजूद दोनों के बीच रिश्ते को सामान्य करने की कोई ठोस संभावना नजर नहीं आई।
मद्रास हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच समझौते की संभावना तलाशने की भी कोशिश की। अदालत ने बातचीत के जरिए विवाद खत्म कर दोनों को दोबारा साथ लाने का प्रयास किया, लेकिन यह कोशिश सफल नहीं हुई।
अदालत ने पाया कि दोनों के रिश्ते में काफी कड़वाहट आ चुकी है। इतने लंबे समय तक अलग रहने और साथ रहने की कोई वास्तविक संभावना नहीं होने के कारण वैवाहिक रिश्ता व्यावहारिक रूप से समाप्त हो चुका है।
लंबे अलगाव को मानसिक क्रूरता के दायरे में माना जा सकता है
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी संदर्भ दिया। अदालत ने कहा कि परिस्थितियों के आधार पर लंबे समय तक अलग रहना, वैवाहिक जीवन का खत्म हो जाना और रिश्ते का पूरी तरह टूट जाना मानसिक क्रूरता (Mental Cruelty) के दायरे में आ सकता है।
इस मामले में भी अदालत ने माना कि पति-पत्नी के बीच रिश्ते में इतनी गहरी दरार आ चुकी है कि अब उनके दोबारा साथ आने की कोई वास्तविक संभावना नहीं बची है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 2021 के आदेश को पलट दिया और पति को तलाक की अनुमति दे दी।
अवैध संबंध के आरोप पर पति को नहीं मिली राहत
पति ने पत्नी पर किसी दूसरे व्यक्ति के साथ अवैध संबंध होने का आरोप भी लगाया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस आरोप को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने कहा कि जिस व्यक्ति को पत्नी का कथित प्रेमी बताया गया था, उसे मामले में पक्षकार ही नहीं बनाया गया। कोर्ट के मुताबिक, यदि किसी तीसरे व्यक्ति के साथ अवैध संबंध का गंभीर आरोप लगाया जाता है तो उस व्यक्ति को भी मामले में शामिल करना जरूरी है।
ऐसा नहीं किए जाने की स्थिति में केवल आरोप के आधार पर पत्नी के खिलाफ अवैध संबंध की बात को साबित नहीं माना जा सकता। इसलिए पति को इस आधार पर तलाक की राहत नहीं दी गई।
पत्नी को ₹7 लाख गुजारा भत्ता देने का आदेश
हाईकोर्ट ने तलाक मंजूर करते समय पत्नी के आर्थिक हितों को भी ध्यान में रखा। अदालत ने पति को पत्नी को ₹7 लाख की गुजारा भत्ता राशि देने का निर्देश दिया।
इस मामले में हाईकोर्ट का फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अदालत ने एक तरफ लंबे समय से टूट चुके रिश्ते को खत्म करने की अनुमति दी, वहीं दूसरी तरफ बिना पर्याप्त आधार के लगाए गए अवैध संबंध के आरोप को स्वीकार नहीं किया।
कुल मिलाकर, Madras High Court Divorce मामले में अदालत की टिप्पणी वैवाहिक रिश्ते में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, लंबे अलगाव और टूट चुके विवाह को लेकर महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने साफ किया कि पत्नी से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह हर परिस्थिति में पति के पीछे-पीछे चले। वहीं, जब लंबे समय तक अलगाव और रिश्ते के पूरी तरह खत्म होने की स्थिति सामने हो, तो परिस्थितियों के आधार पर इसे मानसिक क्रूरता के रूप में भी देखा जा सकता है।














