उमाकांत त्रिपाठी। देश की राजनीति में एक बार फिर महिला आरक्षण का मुद्दा केंद्र में आ गया है। संसद में महिला आरक्षण बिल यानी नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर जोरदार बहस हुई, लेकिन अंततः यह बिल पास नहीं हो सका। वोटिंग के दौरान 528 सांसदों ने हिस्सा लिया, जिनमें 298 ने समर्थन किया, जबकि 230 सांसदों ने इसका विरोध किया। नतीजा—बिल खारिज हो गया और इसके साथ ही सियासी बयानबाज़ी तेज हो गई।
चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भावुक और आक्रामक अंदाज़ में विपक्ष पर निशाना साधा। उन्होंने साफ कहा कि इस बिल से देश के किसी भी हिस्से—चाहे उत्तर हो, दक्षिण, पूर्व या पश्चिम—को कोई नुकसान नहीं होगा। पीएम ने यह भी भरोसा दिलाया कि परिसीमन की मौजूदा व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
सबसे ज्यादा चर्चा में रहा पीएम मोदी का वो बयान जिसमें उन्होंने कहा—“क्रेडिट ले लो, गारंटी ले लो, लेकिन महिलाओं को उनका हक दे दो।” उन्होंने विपक्ष को खुली चुनौती देते हुए कहा कि अगर बिल पास होता है, तो वे सरकारी खर्च पर विज्ञापन देकर सभी दलों को धन्यवाद देने के लिए तैयार हैं। यहां तक कि उन्होंने कहा कि सबकी फोटो छपवा देंगे, बस इस बिल का समर्थन किया जाए।
प्रधानमंत्री ने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि जो भी पहले महिलाओं के अधिकारों का विरोध करता रहा है, जनता ने उन्हें सजा दी है। उन्होंने इसे “प्रायश्चित का समय” बताया और सभी दलों से अपील की कि इस मुद्दे को राजनीतिक चश्मे से न देखा जाए, बल्कि देश के विकास के नजरिए से स्वीकार किया जाए।
हालांकि, विपक्ष ने इस बिल को लेकर गंभीर सवाल उठाए। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि उनकी पार्टी हमेशा से महिला अधिकारों के पक्ष में रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार खुद 33% आरक्षण की बात कर रही है, तो उसे तुरंत लागू क्यों नहीं किया जा रहा?
प्रियंका गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार महिला आरक्षण के नाम पर देश के बुनियादी ढांचे से खिलवाड़ कर रही है। उन्होंने कहा कि असली मुद्दा परिसीमन है, और सरकार इस मुद्दे पर देश की जनता को गुमराह कर रही है। उन्होंने असम का उदाहरण देते हुए कहा कि परिसीमन के जरिए संसद में राज्यों की ताकत को बदला जा सकता है, जिससे लोकतंत्र पर खतरा पैदा हो सकता है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि परिसीमन आयोग में सरकार द्वारा चुने गए लोग देश के लोकतंत्र को कमजोर कर सकते हैं। उनके मुताबिक, यह बिल अगर मौजूदा स्वरूप में लागू होता है, तो देश की लोकतांत्रिक संरचना प्रभावित हो सकती है।
इस पूरे विवाद के बीच एक बात साफ है कि महिला आरक्षण का मुद्दा अब सिर्फ सामाजिक नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। एक तरफ सरकार इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक रणनीति और सत्ता संतुलन से जोड़कर देख रहा है।
अब सवाल ये है कि क्या आने वाले समय में इस बिल पर सहमति बन पाएगी, या यह मुद्दा यूं ही सियासी बहस का हिस्सा बना रहेगा।














