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अगर ‘श्यामा प्रसाद मुखर्जी न होते तो… गुजरात में कश्मीर को लेकर गृहमंत्री अमित शाह का बड़ा बयान

उमाकांत त्रिपाठी।देश की राजनीति और कश्मीर के मुद्दे पर बड़ा बयान देते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को श्यामा प्रसाद मुखर्जी को याद किया। गुजरात के आणंद में आयोजित कार्यक्रम में अमित शाह ने कहा कि अगर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी न होते तो आज कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा न बन पाता। उन्होंने मुखर्जी के बलिदान और राष्ट्र के लिए उनके योगदान को याद किया।

शाह ने कहा कि- श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अनुच्छेद 370 और जम्मू-कश्मीर को दी गई विशेष स्थिति का जोरदार विरोध किया था। उन्होंने ‘एक देश में दो प्रधान, दो निशान और दो विधान नहीं चलेंगे’ का नारा दिया। शाह ने कहा कि- मुखर्जी ने कश्मीर की एकता के लिए खुद को बलिदान कर दिया, तभी जाकर आज जम्मू-कश्मीर भारत का पूरा हिस्सा है।

बंगाल और भारत की एकता में भी अहम भूमिका- शाह
गृह मंत्री ने कहा कि- पश्चिम बंगाल को भारत का हिस्सा बनाए रखने में भी श्यामा प्रसाद मुखर्जी की बड़ी भूमिका रही। उन्होंने स्वामी प्रणवानंद के साथ मिलकर बंगाल की भारत में एकता सुनिश्चित की। शाह ने कहा कि- जिस पार्टी की शुरुआत मुखर्जी ने सिर्फ 10 लोगों के साथ की थी, आज वही भारतीय जनता पार्टी दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन चुकी है।

नेहरू सरकार से इस्तीफा देकर बनाई थी जनसंघ
श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आजादी के बाद नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल होकर देश की औद्योगिक नीति बनाने में अहम योगदान दिया। उन्होंने चित्तरंजन लोकोमोटिव फैक्ट्री, सिंदरी फर्टिलाइज़र और हिंदुस्तान जैसी कई संस्थाओं की नींव रखी। लेकिन बाद में नेहरू सरकार की तुष्टीकरण नीति से असहमति जताते हुए उन्होंने इस्तीफा दे दिया और 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की।

मुखर्जी के योगदान से मजबूत हुआ देश का औद्योगिक ढांचा
शाह ने कहा कि-  मुखर्जी केवल राजनीतिक नेता नहीं थे, बल्कि एक शिक्षाविद्, देशभक्त और दूरदर्शी भी थे। उनके पिता अशुतोष मुखर्जी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर और हाई कोर्ट के जज रहते देश की शिक्षा और न्याय व्यवस्था को मजबूत किया। मुखर्जी ने भी शिक्षा, उद्योग और राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी।

गिरफ्तारी और बलिदान ने देश को झकझोरा
श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1953 में जम्मू-कश्मीर दौरे पर गए थे, जहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के दौरान ही 23 जून 1953 को रहस्यमयी परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। शाह ने कहा कि उनके इस बलिदान ने देश को झकझोर दिया और कश्मीर की एकता का मुद्दा देश की राजनीति का अहम हिस्सा बन गया।

भाजपा ने मुखर्जी को बताया राष्ट्र निर्माता
कार्यक्रम में भाजपा नेताओं ने भी मुखर्जी को याद किया। पार्टी की वेबसाइट पर उनके योगदान का जिक्र करते हुए लिखा गया कि उन्होंने देश की अखंडता, शिक्षा, उद्योग और राष्ट्रवाद के लिए जो काम किया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा। शाह ने कहा कि- – आज जब देश ‘विकसित भारत’ के संकल्प की ओर बढ़ रहा है, तब मुखर्जी जैसे नेताओं का बलिदान याद रखना जरूरी है।

 

 

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